भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

पृष्ठ 354, कुल 405 में से

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पृष्ठ 354

अठारहवाँ प्रकरण । ३४७

पदच्छेदः ।

शुद्धस्फुरणरूपस्य, दृश्यभावम्, अपश्यतः, क्व, विधिः, क्व, च, वैराग्यम्, क्व, त्यागः, क्व, शमः, अपि, वा ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
दृश्यभावम् =दृश्यभाव कोच =और
अपश्यतः =नहीं देखते हुएक्व =कहाँ
शुद्धस्फुरण-रूपस्य =शुद्ध स्फुरण-रूप वाले कोत्यागः =त्याग है
वा अपि =अथवा
क्व =कहाँक्व =कहाँ
विधिः =कर्म की विधि हैशमः =शम है ॥

भावार्थ ।

जो विद्वान् शुद्ध-स्वरूप, स्वप्रकाश, चिद्रूप, अपने आपको देखता है, वह किसी और दृश्य पदार्थ को नहीं देखता है । उसको कर्म में राग कहाँ है ? और विधि कहाँ है ? और किस विषय में उसको वैराग्य है,और किसमें शम है ॥ ७१ ॥

मूलम् ।

स्फुरतोऽनन्तरूपेण प्रकृतिं च न पश्यतः ।
क्व बन्धः क्व च वा मोक्षः क्व हर्षः क्व विषादता ॥ ७२ ॥

पदच्छेदः ।

स्फुरतः, अनन्तरूपेण, प्रकृतिम्, च, न, पश्यतः, क्व, बन्धः, क्व, च, वा, मोक्षः, क्व, हर्ष, क्व, विषादता ॥

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