भारतकोश
संग्रह पर लौटें

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

अठारहवाँ प्रकरण । ३०१

सः = वह | श्रीमान् = शोभायमान
सुखी = सुखी | शोभते = शोभा को प्राप्त होता है ॥

भावार्थ ।

मैं इस कार्य को करूँगा ऐसा न कहता हुआ जीवन्मुक्त प्रारब्धवश से कार्य को करता है, पर बालक की तरह वह मूर्ख नहीं हो जाता है। सांसारिक व्यवहार को करता हुआ भी वह प्रसन्न शान्तचित्तवाला शोभायमान प्रतीत होता है ॥ २६ ॥

मूलम् ।

नानाविचारसुश्रान्तो धीरो विश्रान्तिमागतः ।
न कल्पते न जानाति न शृणोति न पश्यति ॥ २७ ॥

पदच्छेदः ।

नानाविचारसुश्रान्तः, धीरः, विश्रान्तिम्, आगतः, न, कल्पते, न, जानाति, न, शृणोति, न, पश्यति ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
यतः= जिस कारणअतएव= इसी कारण
नानाविचार-सुश्रान्तः= द्वैत के विचार से निवृत्त हुआसः= वह
धीरः= ज्ञानीन कल्पते= न कल्पना करता है
विश्रान्तिम्= शान्ति कीन जानाति= न जानता है
आगतः= प्राप्त हुआ हैन शृणोति= न सुनता है
न पश्यति= न देखता है ॥

भावार्थ ।

हे शिष्य ! नाना प्रकार के विचारों से रहित ज्ञानी अन्तरात्मा

३०२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

में ही शान्ति को प्राप्त रहता है। वह संकल्पादिक मन के व्यापारों को नहीं करता है और न बुद्धि के व्यापारों को करता है, और न वह इन्द्रियों के व्यापारों को करता है, क्योंकि उसमें कर्त्तत्वादिकों का अभिमान नहीं है ॥ २७ ॥

मूलम् ।

असमाधेरविक्षेपान्न मुमुक्षुर्न चेतरः । निश्चित्य कल्पितं पश्यन् ब्रह्मैवास्तेमहाशयः ॥ २८ ॥

पदच्छेदः ।

असमाधेः, अविक्षेपात्, न, मुमुक्षुः, न, च, इतरः, निश्चित्य, कल्पितम्, पश्यन्, ब्रह्म, एव, आस्ते, महाशयः ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
महाशयः=ज्ञानीनिश्चित्य=निश्चय करके
असमाधेः=समाधि रहित होने सेइदम् सर्वम्=इस सब जगत् को
मुमुक्षुः न=मुमुक्ष नहीं हैकल्पितम्=कल्पित
च=औरपश्यन्=समझता हुआ
अविक्षेपात्=द्वैत भ्रम के अभाव सेब्रह्म एव=ब्रह्मवत्
इतरः न=बद्ध नहीं हैआस्ते=स्थित रहता है ॥
परन्तु=परन्तु

भावार्थ ।

ज्ञानी मुमुक्षु नहीं होता है, क्योंकि विक्षेप की निवृत्ति के लिये मुमुक्षु समाधि को करता है। ज्ञानी में विक्षेप है नहीं, इसी लिये वह समाधि को नहीं करता है। उसमें बन्ध भी नहीं है, क्योंकि

अठारहवाँ प्रकरण । ३०३

द्वैतभ्रम उसका नष्ट हो गया है । जिसको द्वैतभ्रम होता है उसी को बंध भी होता है ।

**प्रश्न—**फिर वह ज्ञानी कैसा है ?

**उत्तर—**वह ब्रह्मरूप है, क्योंकि संपूर्ण जगत् उसको पूर्व ही से कल्पित प्रतीत होता है, पश्चात् वह बाधितानुवृत्ति करके जगत् को देखता है, इसी कारण वह निर्विकार चित्त-वाला ही होता है ॥ २८ ॥

मूलम् ।

यस्यान्तः स्यादहंकारो न करोति करोतिसः । निरहंकारधीरेण न किञ्चिदकृतं कृतम् ॥ २९ ॥

पदच्छेदः ।

यस्य, अन्तः, स्यात्, अहंकारः, न, करोति, करोति, सः, निरहंकारधीरेण, न, किञ्चित्, अकृतम्, कृतम् ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
यस्य=जिसके<br>अन्तः=अन्तःकरण में<br>अहंकारः=अहंकार का अध्यास<br>स्यात्=है<br>सः=वह<br>+यद्यपि लोकदृष्ट्या=यद्यपि लोक-दृष्टि करके<br>न करोति=नहीं कर्म करता है<br>तु अपि=तो भी<br>करोति=मन में सङ्कल्पादि कर्म करता हैनिरहंकारधीरेण=अहंकार-रहित ज्ञानी करके<br>यद्यपि-लोक-दृष्ट्या=यद्यपि लोक- दृष्टि से<br>न किञ्चित्=कुछ भी नहीं<br>कृतम्=किया गया है<br>तथापि=तथापि<br>स्वदृष्ट्या=अपनी दृष्टि से<br>तत्=वह<br>कृतम्=किया गया है ॥

३०४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

भावार्थ । प्रश्न—संसार को देखता हुआ भी वह कैसे ब्रह्म-रूप हो सकता है ? उत्तर—जिस पुरुष के अंतःकरण में अहंकार का अध्यास होता है, वह लोक-दृष्टि करके न करता हुआ भी संकल्पादिकों को करता है । जैसे जब कोई जटारखाकर, धूनी लगाकर, मौन होकर बैठ जाता है, तब लोग कहते हैं कि बाबाजी कुछ नहीं करते हैं। पर वह भीतर मन में संकल्प करता है कि कोई बड़ा आदमी आवे, तो भाँग-बूटी का काम चले; इस तरह से ज्ञानी का व्यवहार नहीं होता है। उसको भीतर से ही संकल्प-विकल्प नहीं फुरते हैं। इसी वास्ते वह कर्तृत्वादि अध्यास से रहित है ॥ २९ ॥

मूलम् । नोद्विग्नं न च संतुष्टमकतृ॑ स्पन्दवर्जितम् । निराशं गतसंदेहं चित्तं मुक्तस्य राजते ॥ ३० ॥

पदच्छेदः । न, उद्विग्नम्, संतुष्टम्, अकर्तृ॑ स्पन्दवर्जितम्, निराशम्, गतसंदेहम्, चित्तम्, मुक्तस्य, राजते ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
मुक्तस्य=ज्ञानी कानिराशम्=आशा-रहित
$\left.\begin{aligned}अकर्तृ स्पन्द- \ वर्जितम्\end{aligned}\right}=$$\left{\begin{aligned}&कर्तृत्व-रहित और \ &संकल्प विकल्प-रहित\end{aligned}\right.$गतसंदेहम्=संदेह-रहित
चित्तम्=चित्त

अठारहवाँ प्रकरण । ३०५

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
न उद्विग्नम्= न द्वेष हैन संतुष्टम्= न संतोष को
= औरराजते= प्राप्त होता है ॥

भावार्थ ।

अष्टावक्रजी कहते हैं कि जीवन्मुक्त का चित्त प्रकाश-रूप है, इसी वास्ते वह उद्वेग को नहीं प्राप्त होता है । क्योंकि उद्वेग का हेतु जो द्वैत है, वह उसके चित्त में नहीं रहा है, और संकल्प-विकल्प से भी शून्य है, इसी वास्ते उसका चित्त जगत् से निराश है, और संदेह से भी रहित है । क्योंकि संदेह का हेतु जो अज्ञान है, वह उसमें नहीं रहा ॥ ३० ॥

मूलम् ।

निध्यातुं चेष्टितुं वापि यच्चित्तं न प्रवर्तते ।
निर्निमित्तमिदं किन्तु निध्यायति विचेष्टते ॥ ३१ ॥

पदच्छेदः ।

निध्यातुम्, चेष्टितुम्, वा, अपि, यत्, चित्तम्, न, प्रवर्तते, निर्निमित्तम्, इदम्, किन्तु, निध्यायति, विचेष्टते ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
ज्ञानिनः= ज्ञानी कावा अपि= अथवा
यत्= जोचेष्टितुम्= चेष्टा करने को
चित्तम्= चित्त हैन प्रवर्तते= नहीं प्रवृत्त होता है
तत्= वहकिन्तु= परन्तु
निध्यातुम्= $\Big{$ निष्क्रिय भाव में स्थित होने कोइदम्= वह चित्त
निर्निमित्तम्= संकल्प-रहित

३०६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

निध्यायति=निश्चल स्थित होता है च=और | विचेष्टते= { नाना प्रकार की चेष्टा को करता है

भावार्थ ।

अष्टावक्रजी कहते हैं कि जिस ज्ञानी का चित्त संकल्प-विकल्परूपी चेष्टा करने में प्रवृत्त नहीं होता है, किन्तु वह चित्त के निश्चल और शुद्ध होने से अपने स्वरूप में स्थिर होता है ॥ ३१ ॥

मूलम् ।

तत्त्वं यथार्थमाकर्ण्य मन्दः प्राप्नोति मूढताम् । अथवाऽऽयातिसङ्कोचनमूढः कोऽपि मूढवत् ॥ ३२ ॥

पदच्छेदः ।

तत्त्वम्, यथार्थम्, आकर्ण्य, मन्दः, प्राप्नोति, मूढताम् अथवा, आयाति, सङ्कोचम्, अमूढः, कः, अपि, मूढवत् ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
मन्दः=अज्ञानीआयाति=प्राप्त होता है
यथार्थम्तत्त्वम्= { तत्त्व पदार्थ अर्थात् उपनिषदादिकों को=और<br>तथा एव=वैसा ही
आकर्ण्य=सुन करकः अपि=और कोई
मूढताम्= { मूढ़ता अर्थात् संशय-विपर्यय कोअमूढः=ज्ञानी<br>मूढवत्=अज्ञानी की तरह
प्राप्नोति=प्राप्त होता हैमूढताम्= { संशय-विपर्यय अर्थात् व्यवहार को
अथवा=अथवा+वाह्यदृष्ट्या=वाह्य-दृष्टि से
सङ्कोचम्=चित्त की समाधि कोप्राप्नोति=प्राप्त होता है ॥

अठारहवाँ प्रकरण । ३०७

भावार्थ ।

हे शिष्य ! मन्द पुरुष तत् और त्वं पद के कल्पित भेद को श्रुति से श्रवण करके भी संशय-विपर्यय के कारण मूढ़ता को ही प्राप्त होता है अथवा तत् और त्वं पद के अभेद अर्थ के जानने के लिये समाधि को लगाता है । परन्तु हजारों में कोई एक पुरुष अंतर से शान्त चित्तवाला होकर, बाहर से मूढ़वत् व्यवहार करता है ॥ ३२ ॥

मूलम् ।

एकाग्रता निरोधो वा मूढैरभ्यस्यते भृशम् । धीराः कृत्यं न पश्यन्ति सुप्तवत्स्वपदे स्थिताः ॥ ३३ ॥

पदच्छेदः ।

एकाग्रता, निरोधः, वा, मूढैः, अभ्यस्यते, भृशम्, धीराः, कृत्यम्, न, पश्यन्ति, सुप्तवत्, स्वपदे, स्थिताः ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
एकाग्रता = चित्त की एकाग्रताकृत्यम् = पूर्व कृत्य को अर्थात् चित्त की एकाग्रता को और निरोधता को
वा = या
निरोधः = चित्त की निरोधतान पश्यन्ति = नहीं देखते हैं
मूढैः = अज्ञानियों करकेपरन्तु = परन्तु
भृशम् = अत्यन्तसुप्तवत् = सोए हुए पुरुष की तरह
अभ्यस्यते = अभ्यास किया जाता हैस्वपदे = अपने स्वरूप में
धीराः = ज्ञानी पुरुषस्थिताः = स्थित रहते हैं ॥

३०८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

भावार्थ ।

मुमुक्षुजन चित्त की एकाग्रता के लिये और विपरीत याचना की निवृत्ति के लिये यत्न करते हैं । परन्तु जो धीर पुरुष है, वह कुछ भी पूर्वोक्त कृत्य को नहीं देखता है । क्योंकि वह अपने स्वरूप में ही स्थित है ॥ ३३ ॥

मूलम् ।

अप्रयत्नात्प्रयत्नाद्वा मूढो नाप्नोति निर्वृतिम् । तत्त्वनिश्चयमात्रेण प्राज्ञो भवति निर्वृतः ॥ ३४ ॥

पदच्छेदः ।

अप्रयत्नात्, प्रयत्नात्, वा, मूढः, न, आप्नोति, निर्वृतिम्, तत्त्वनिश्चयमात्रेण, प्राज्ञः, भवति, निर्वृतः ।

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
मूढः=अज्ञानी पुरुषप्राज्ञः=ज्ञानी पुरुष
अप्रयत्नात्=चित्त के निरोध सेतत्त्वनिश्चय-मात्रेण=केवल तत्त्व के निश्चय करने से ही
वा=अथवा
प्रयत्नात्=कर्मानुष्ठान सेनिर्वृतः=कृतार्थ
निर्वृतिम्=परम सुख कोभवति=होता है ॥
न आप्नोति=नहीं प्राप्त होता है

भावार्थ ।

जिस पुरुष को जीव-ब्रह्म की एकता का निश्चय नहीं है, वही पुरुष मूर्ख कहा जाता है। वह पुरुष चाहे चित्त की निरोध-रूपी समाधि को करे अथवा कर्मों के अनुष्ठान को करे, वह कदापि

अठारहवाँ प्रकरण । ३०९

परम सुख को नहीं प्राप्त होता है। क्योंकि आनंद का हेतु जो आत्मा का अनुभव, वह उसको है नहीं और जो विद्वान् ज्ञानी है, वह न समाधि को और न कर्मों को करता है परन्तु निर्वृत्ति को अर्थात् नित्यसुख को प्राप्त होता है। क्योंकि उसको कुछ कर्तव्य बाकी नहीं रहा। गीता में भी कहा है—

यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः ।
आत्मन्येव च संतुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते ॥ १ ॥

आत्मा में ही जिसकी रति है और अपने आत्मानंद करके ही जो तृप्त है, आत्मा में ही जो संतुष्ट है, बाहर के पदार्थों में जिसको तोष नहीं है, उसको कोई भी कर्तव्य बाकी नहीं रहा है ॥ ३४ ॥

मूलम् ।

शुद्धं बुद्धं प्रियं पूर्णं निष्प्रपञ्चं निरामयम् ।
आत्मानं तं न जानन्ति तत्राभ्यासपरा जना ॥ ३५ ॥

पदच्छेदः ।

शुद्धम्, बुद्धम्, प्रियम्, पूर्णम्, निष्प्रपञ्चम्, निरामयम्, आत्मानम्, तम्, न, जानन्ति, तत्र, अभ्यासपराः, जनाः ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
तत्र = इस संसार मेंपूर्णम् = पूर्ण
अभ्यासपरा = अभ्यासीनिष्प्रपञ्चम् = प्रपञ्च-रहित
जनाः = मनुष्य = और
तम् = उसनिरामयम् = दुःख-रहित
शुद्धम् = शुद्धआत्मानम् = आत्मा को
बुद्धम् = चैतन्यन जानन्ति = नहीं जानते हैं ॥
प्रियम् = प्रिय

३१० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

भावार्थ । जगत् में कर्मादिकों के अभ्यासपरायण जो अज्ञानी पुरुष हैं, वे उस आत्मा को नहीं जानते हैं, जो शुद्ध है अर्थात् जो मायामल से रहित है, जो स्वप्रकाश है, जो परिपूर्ण है, जो प्रपञ्च से रहित है और जो दुःख के सम्बन्ध से भी रहित है ॥३५॥

मूलम् । नाप्नोति कर्मणा मोक्षं विमूढोऽभ्यासरूपिणा । धन्यो विज्ञानमात्रेण मुक्तस्तिष्ठत्यविक्रियः ॥ ३६ ॥

पदच्छेदः । न, आप्नोति, कर्मणा, मोक्षम्, विमूढः, अभ्यासरूपिणा, धन्यः, विज्ञानमात्रेण, मुक्तः, तिष्ठति, अविक्रियः ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
विमूढः=अज्ञानीधन्यः=भाग्यवान्
अभ्यासरूपिणा=अभ्यासरूपीपुरुषः=पुरुष
कर्मणा=कर्म सेविज्ञानमात्रेण=केवल ज्ञान करके ही
मोक्षम्=मोक्ष कोमुक्तः=मुक्त हुआ
न आप्नोति=नहीं प्राप्त होता हैतिष्ठति= स्थित रहता है ॥ अर्थात् मोक्ष को प्राप्त होता है ॥
अविक्रियः=क्रिया-रहित'

भावार्थ । अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! जो मूढ़ अज्ञानी जन है, वह कर्मों करके अर्थात् योगाभ्यास-रूप कर्मों करके भी मोक्ष को कदापि नहीं प्राप्त होते हैं ।

अठारहवाँ प्रकरण । ३११

तथाच—न कर्मणा न प्रजया न धनेन ।

कर्मों करके, प्रजा करके, धन करके, पुरुष मोक्ष को कदापि प्राप्त नहीं होता है, परन्तु जिसका अविद्या-मल दूर हो गया है, वह केवल विज्ञान-मात्र करके मोक्ष को प्राप्त हो जाता है ॥ ३६ ॥

मूलम् ।

मूढो नाप्नोति तद्ब्रह्म यतो भवितुमिच्छति । अनिच्छन्नपि धीरो हि परब्रह्म स्वरूपभाक् ॥ ३७ ॥

पदच्छेदः ।

मूढः, न, आप्नोति, तत्, ब्रह्म, यतः, भवितुम्, इच्छति, अनिच्छन्, अपि, धीरः, हि, परब्रह्मस्वरूपभाक् ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
यतः=जिस कारणन आप्नोति=नहीं प्राप्त होता है
मूढः=अज्ञानीधीरः=ज्ञानी
ब्रह्म=ब्रह्महि=निश्चय करके
भवितुम्=होने कोअनिच्छन्नपि=नहीं चाहता हुआ भी
इच्छति=इच्छा करता है$\left. परब्रह्मस्वरूप- भाक् \right}=परब्रह्म-स्वरूप का भजनेवाला
ततः=उसी कारण
सः=वहभवति=होता है ॥
तत्=उसको अर्थात् ब्रह्म को

भावार्थ ।

अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! अज्ञानी मूढ़ चित्त के निरोध करने से ब्रह्म-रूप होने की इच्छा करता है, इसी

३१२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

वास्ते वह ब्रह्म को नहीं प्राप्त होता है । और जिस धीर ने अपने को ज्ञानी निश्चय कर लिया है, वह मोक्ष की नहीं इच्छा करता हुआ भी मोक्ष को प्राप्त होता है ॥ ३७ ॥

मूलम् ।

निराधारा ग्रहव्यग्रा मूढाः संसारपोषकाः । एतस्यानर्थमूलस्य मूलच्छेदः कृतो बुधैः ॥ ३८ ॥

पदच्छेदः ।

निराधाराः, ग्रहव्यग्राः, मूढाः, संसारपोषकाः, एतस्य, अनर्थमूलस्य, मूलच्छेदः, कृतः, बुधैः ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
निराधाराः=आधार-रहितअनर्थमूलस्य=अनर्थ-रूप मूलवाले
ग्रहव्यग्राः=दुराग्रहीसंसारस्य=संसार के
मूढाः=अज्ञानमूलच्छेदः=मूल का नाश
संसारपोषकाः= { संसार के पोषण करनेवाले हैंबुधैः=ज्ञानियों करके
एतस्य=इसकृतः=किया गया है ॥

भावार्थ ।

जो मूढ़ अज्ञानी है, उसका ऐसा ख्याल है कि मैं वेदान्त-शास्त्र और आत्मवित् गुरु के आधार के विना ही केवल चित्त के निरोध से ही मोक्ष को प्राप्त हो जाऊँगा, ऐसा दुराग्रही पुरुष संसार से छुड़ानेवाला जो ज्ञान है, उससे पराङ्मुख होता है, इस संसार के मूलाज्ञान को वह छेदन नहीं कर सकता है ॥ ३८ ॥

अठारहवाँ प्रकरण । ३१३

मूलम् ।

न शान्तिं लभते मूढो यतः शमितुमिच्छति । धीरस्तत्त्वं विनिश्चित्यसर्वदा शान्तमानसः ॥ ३९ ॥

पदच्छेदः ।

न, शान्तिम्, लभते, मूढः, यतः, शमितुम्, इच्छति, धीरः, तत्त्वम्, विनिश्चित्य, सर्वदा, शान्तमानसः ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
यतः=जिस कारणन लभते=नहीं प्राप्त होता है
शमितुम्=शान्त होने कोधीरः=ज्ञानी
मूढः=अज्ञानीतत्त्वम्=तत्त्व को
इच्छति=इच्छा करता हैविनिश्चित्य=निश्चय करके
ततः=इसी कारणसर्वदा=सर्वदा
सः=वहशान्तमानसः=शान्त मनवाला है ॥
शान्तिम्=शान्ति को

भावार्थ ।

अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! मूढ़ अज्ञानी जिस हेतु चित्त के निरोध से शान्ति की इच्छा करता है, इसी वास्ते वह शान्ति को नहीं प्राप्त होता है । धीर जो है सो आत्मतत्त्व को निश्चय करके शान्ति की इच्छा नहीं करता है, इसी लिये शान्ति को प्राप्त होता है ॥ ३९ ॥

मूलम् ।

क्वात्मनो दर्शनं तस्य यद्दृष्टमवलम्बते । धीरास्तंतं पश्यन्ति पश्यन्त्यात्मानमव्ययम् ॥ ४० ॥

३१४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

पदच्छेदः ।

क्व, आत्मनः, दर्शनम्, तस्य, यत्, दृष्टम्, अवलम्बते, धीराः, तम्, तम्, न, पश्यन्ति, पश्यन्ति, आत्मानम्, अव्ययम् ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
तस्य=उसकोधीराः=ज्ञानी
आत्मनः=आत्मा कातम् तम्=उस
दर्शनम्=दर्शनदृष्टम्=दृष्ट को
क्व=कहाँ हैन पश्यन्ति=नहीं देखते हैं
यत्=जोपरन्तु=परन्तु
दृष्टम्=दृष्ट कोअव्ययम्=अविनाशी
अवलम्बते=अवलम्बन करता हैआत्मानम्=आत्मा को
पश्यन्ति=देखते हैं ॥

भावार्थ ।

जो अज्ञानी पुरुष है, वह प्रत्यक्ष प्रमाणों करके ही जाने हुए पदार्थों को सत्य-रूप करके मानता है, इसी कारण उसको आत्म-दर्शन कदापि नहीं प्राप्त होता है। और जो ज्ञानी है, वह देखते हुए पदार्थों को नहीं देखता है। किन्तु उनके अन्तर्गत कारण-शक्ति सर्वत्र चिद्रूप आत्मा को ही देखता है, इसी कारण वह परमात्मा में सदा लीन रहता है, और कार्य-रूपी बाह्य पदार्थ उसको कोई भी दिखाई नहीं देता है ॥ ४० ॥

मूलम् ।

क्व निरोधो विमूढस्य यो निर्बन्धं करोति वै । स्वारामस्यैव धीरस्य सर्वदाऽसावकृत्रिमः ॥ ४१ ॥

अठारहवां प्रकरण । ३१५

पदच्छेदः । क्व, निरोधः, विमूढस्य, यः, निर्बन्धम्, करोति, वै, स्वरामस्य, एव, धीरस्य, सर्वदा, असौ, अकृत्रिमः ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
यः=जोस्वरामस्य=आत्माराम
निर्बन्धम्=चित्त के निरोध कोधीरस्य=ज्ञानी को
वै=हठ करकेसर्वदां=सदैव
करोति=करता हैएव=निश्चय करके
तस्य=उसअसौ=यह
विमूढस्य=अज्ञानी कोचित्तनिरोधः=चित्त का निरोध
क्व=कहाँअकृत्रिमः=स्वाभाविक है ॥
निरोधः=चित्त का निरोध है

भावार्थ । जो अज्ञानी पुरुष शुष्कचित्त के निरोध में हठ करता है, उसका चित्त कभी निरोध को नहीं प्राप्त होता है । अज्ञानी ही चित्त के निरोध के लिये समाधि लगाता है । जब वह समाधि से उत्थान करता है, तब फिर उसका चित्त संसार के पदार्थों में फैल जाता है । और जो आत्मा में स्मरण करनेवाला योगी है, जिसका चित्त निश्चल है, उसका चित्त सर्वदा आत्मा में ही निरुद्ध रहता है, इसी कारण सर्वदा उसकी समाधि बनी रहती है ॥ ४१ ॥

मूलम् । भावस्य भावकः कश्चिन्न किञ्चिद्भावकोऽपरः । उभयाऽभावकः कश्चिदेवमेव निराकुलः ॥ ४२ ॥

३१६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

पदच्छेदः ।

भावस्य, भावकः, कश्चित्, न, किञ्चित्, भावकः, अपरः, उभयाऽभावकः, कश्चित्, एवम्, एव, निराकुलः ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
कश्चित्=कोईभावकः=माननेवाला है
भावस्य=भाव काएवम् एव=वैसा ही
भावकः=माननेवाला हैकश्चित्=कोई
अपरः=और कोई$\left.\begin{aligned} उभया- \ ऽभावकः \end{aligned} \right} =\begin{aligned} &दोनों अर्थात् भाव \ &और अभाव का नहीं \ &माननेवाला \end{aligned}$
किञ्चित्=कुछ भी
=नहीं है
एवम्=ऐसानिराकुलः=स्वस्थ चित्त है ॥

भावार्थ ।

अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे राजन् ! कोई एक नैयायिक ऐसा मानता है कि भाव-रूप प्रपञ्च परमार्थ से सत्य है । और कोई शून्य वादी कहता है कि सब प्रपञ्च शून्य-रूप है, क्योंकि शून्य ही से उसकी उत्पत्ति होती है । और हजारों में से कोई एक आत्मा का अनुभव करनेवाला होता है । वह भाव और अभाव दोनों की भावना का त्याग करके और स्वस्थचित्त होकर अपने आत्मानन्द में ही सदा मग्न रहता है ॥ ४२ ॥

मूलम् ।

शुद्धमद्वयमात्मानं भावयन्ति कुबुद्धयः । न तु जानन्ति संमोहाद्यावज्जीवमनिर्वृताः ॥ ४३ ॥

अठारहवाँ प्रकरण । ३१७

पदच्छेदः । शुद्धम्, अद्वयम्, आत्मानम्, भावयन्ति, कुबुद्धयः, न, तु, जानन्ति, संमोहात्, यावज्जीवम्, अनिवृत्ताः ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
कुबुद्धयःदुर्बुद्धि पुरुषसंमोहात्अज्ञानता के कारण
शुद्धम्शुद्धन जानन्तिनहीं जानते हैं
अद्वयम्अद्वैतअतःइसलिये
आत्मानम्आत्मा कोयावज्जीवम्जब तक उनका जीवन है
भावयन्तिभावना करते हैंअनिवृत्ताःसंतोष-रहित हैं ॥
तुपरन्तु

भावार्थ । अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! अज्ञानी मूढ़ शुद्ध निर्मल द्वैत से रहित व्यापक आत्मा का अनुभव नहीं करते हैं, क्योंकि उनका मोह सांसारिक पदार्थों से निवृत्त नहीं हुआ है । इसी कारण उनको आत्मा का साक्षात्कार नहीं होता है । जब तक वे जीते हैं, सन्तोष को कदापि नहीं प्राप्त होते हैं । आत्मा के साक्षात्कार होने के विना सन्तोष की प्राप्ति नहीं हो सकती है ॥ ४३ ॥

मूलम् । मुमुक्षोर्बुद्धिरालम्बमन्तरेण न विद्यते । निरालम्बैव निष्कामा बुद्धिर्मुक्तस्य सर्वदा ॥ ४४ ॥

पदच्छेदः । मुमुक्षोः, बुद्धिः, आलम्बम्, अन्तरेण, न, विद्यते, निरा- लम्बा, एव, निष्कामा, बुद्धिः, मुक्तस्य, सर्वदा ॥

३१८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
मुमुक्षोः =मुमुक्षु पुरुष कीसर्वदा =सब काल में
बुद्धिः =बुद्धिनिष्कामा =कामना-रहित
आलम्बम् अन्तरेण =आलम्ब के बिनाच =और
न विद्यते =नहीं रहती हैनिरालम्बा =आश्रय-रहित
मुक्तस्य =मुक्त पुरुष कीएव =निश्चय करके
बुद्धिः =बुद्धिविद्यते =रहती है ॥

भावार्थ ।

जिसको आत्मा का साक्षात्कार नहीं हुआ है, उसकी बुद्धि सांसारिक विषय का आलम्बन करती है । और जो निष्काम जीवन्मुक्त है, उसकी बुद्धि आत्मा के आश्रय रहती है । आत्मा के अचल होने से वह बुद्धि भी सदैव स्थिर रहती है ॥ ४४ ॥

मूलम् ।

विषयद्वीपिनो वीक्ष्य चकिताः शरणार्थिनः ।
विशन्ति झटिति क्रोडन्निरोधैकाग्रयसिद्धये ॥ ४५ ॥

पदच्छेदः ।

विषयद्वीपिनः, वीक्ष्य, चकिताः, शरणार्थिनः, विशन्ति, झटिति, क्रोडम्, निरोधैकाग्रयसिद्धये ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
विषयद्वीपिनः =विषय-रूपी व्याघ्र कोशरणार्थिनः =अपने शरीर की रक्षा करनेवाले मूढ़ पुरुष
वीक्ष्य =देख करके
चकिताः =डरे हुए

अठारहवाँ प्रकरण । ३१९

निरोधै- ⎧ चित्त की निरोधता ⎹ झटिति=शीघ्र काग्र्य= ⎨ और एकाग्रता की ⎹ क्रोडम्=पहाड़ की गुहा में सिद्धये ⎩ सिद्धि के लिये ⎹ विशन्ति=प्रवेश करते हैं ।।

भावार्थ । मूढ़ मुमुक्षु विषय-रूपी व्याघ्रों को देख करके भय को प्राप्त होता और चित्त की वृत्ति को एकाग्र करने के लिये पहाड़ी कन्दरा में प्रवेश कर जाता है, परन्तु उसका कार्य सिद्ध नहीं होता है, उसकी अन्तर्वृत्ति फैलती जाती है और वह हर दिन दुःखी होता जाता है, शान्ति उसको लेश-मात्र भी नहीं होती है और जो ज्ञानी जीवन्मुक्त है, वह विषय-रूपी व्याघ्र को इन्द्रजाल-जन्य पदार्थों की तरह देखकर उनसे भय नहीं खाता है ॥ ४५ ॥

मूलम् । निर्वासनं हरिं दृष्ट्वा तूष्णीं विषयदन्तिनः । पलायन्ते न शक्तास्ते सेवन्ते कृतचाटवः ॥ ४६ ॥

पदच्छेदः । निर्वासनम्, हरिम्, दृष्ट्वा, तूष्णीम्, विषयदन्तिनः, पलायन्ते, न, शक्ताः, ते, सेवन्ते, कृतचाटवः ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
निर्वासनम्=वासना-रहितन शक्ताः=असमर्थ
पुरुषम्=पुरुष-रूपीविषयदन्तिनः=विषय-रूपी हाथी
हरिम्=सिंह कोतूष्णीम्=चुपचाप हुए
दृष्ट्वा=देखकरपलायन्ते=भागते हैं

३२० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

च = और<br>ते = वे<br>कृतचाटवः = प्रियवादी अर्थात् संसारी पुरुष<br>ईश्वराकृष्टाः = ईश्वर करके प्रेरित हुए$\left. तन्निर्वासनम् पुरुषम् \right}=$ उस वासना-रहित पुरुष को<br>स्वयम् = स्वतः<br>आगत्य = आकर<br>सेवन्ते = सेवन करते हैं ॥

भावार्थ ।

क्योंकि वासना-रहित पुरुष-रूपी सिंह को देखकर, विषय-रूपी हस्ती असमर्थ होकर भाग जाता है । और ऐसे ही नरसिंह की प्रतिष्ठा और सेवा इतर पुरुष ईश्वर करके प्रेरित हुए करते हैं ॥ ४६ ॥

मूलम् ।

न मुक्तिकारिकान्धत्ते निःशङ्को युक्तमानसः ।
पश्यञ्छृण्वन्स्पृशञ्जिघ्रन्नश्नन्नास्ते यथासुखम् ॥ ४७ ॥

पदच्छेदः ।

न, मुक्तिकारिकाम्, धत्ते, निःशङ्कः, युक्तमानसः, पश्यन्, शृण्वन्, स्पृशन्, जिघ्रन्, अश्नन्, आस्ते, यथासुखम् ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
निःशङ्कः = शङ्का-रहित<br>च = और<br>युक्तमानसः = निश्चल मनवाला<br>ज्ञानी = ज्ञानी<br>$\left. मुक्तिका- रिकाम् \right}=$ यमनियमादि योग- क्रिया कोआग्रहात् = आग्रह से<br>न धत्ते = नहीं धारण करता है<br>किन्तु = परन्तु<br>पश्यन् = देखता हुआ<br>शृण्वन् = सुनता हुआ