भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

पृष्ठ 308, कुल 405 में से

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पृष्ठ 308

अठारहवाँ प्रकरण । ३०१

सः = वह | श्रीमान् = शोभायमान
सुखी = सुखी | शोभते = शोभा को प्राप्त होता है ॥

भावार्थ ।

मैं इस कार्य को करूँगा ऐसा न कहता हुआ जीवन्मुक्त प्रारब्धवश से कार्य को करता है, पर बालक की तरह वह मूर्ख नहीं हो जाता है। सांसारिक व्यवहार को करता हुआ भी वह प्रसन्न शान्तचित्तवाला शोभायमान प्रतीत होता है ॥ २६ ॥

मूलम् ।

नानाविचारसुश्रान्तो धीरो विश्रान्तिमागतः ।
न कल्पते न जानाति न शृणोति न पश्यति ॥ २७ ॥

पदच्छेदः ।

नानाविचारसुश्रान्तः, धीरः, विश्रान्तिम्, आगतः, न, कल्पते, न, जानाति, न, शृणोति, न, पश्यति ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
यतः= जिस कारणअतएव= इसी कारण
नानाविचार-सुश्रान्तः= द्वैत के विचार से निवृत्त हुआसः= वह
धीरः= ज्ञानीन कल्पते= न कल्पना करता है
विश्रान्तिम्= शान्ति कीन जानाति= न जानता है
आगतः= प्राप्त हुआ हैन शृणोति= न सुनता है
न पश्यति= न देखता है ॥

भावार्थ ।

हे शिष्य ! नाना प्रकार के विचारों से रहित ज्ञानी अन्तरात्मा

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