भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

पृष्ठ 307, कुल 405 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 307

३०० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

के लिये वह प्रयत्न नहीं करता है । जिस पुरुष का स्त्री आदिकों में राग होता है और जो उसके संग से आनन्द मानता, वही अज्ञानी व्यभिचार के लिये प्रयत्न करता है । जिस पुरुष को कभी मिश्री खाने को नहीं मिली है और न उसके रस को जानता है, वही गुड़ या राब के खाने के लिये यत्न करता है। जिसको नित्य ही मिश्री खाने को मिलती है, वह कदापि गुड़ के रस के लिये यत्न नहीं करता है । जो नीम का कीट है या विष्ठा का ही है, वह मिश्री के स्वाद को नहीं जानता । अज्ञानी पुरुष विष्टा-रूपी विषयानन्द का स्वाद लेनेवाला है । ज्ञानवान् आत्मानन्द-रूपी मिश्री के स्वाद का लेनेवाला है, इस वास्ते अज्ञानी के आनन्द को नहीं जान सकता है ॥ २५ ॥

मूलम् ।

अतद्वादीव कुरुते न भवेदपि बालिशः ।
जीवन्मुक्तः सुखी श्रीमान् संसरन्नपि शोभते ॥ २६ ॥

पदच्छेदः ।

अतद्वादी, इव, कुरुते, न, भवेत्, अपि, बालिश, जीवन्मुक्तः, सुखी, श्रीमान्, संसरन्, अपि, शोभते ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
अतद्वादी इव =उल्टा याने विरुद्ध उस कहनेवाले की तरह किअपि =तो भी
अहं इदं कार्यं न करिष्यामि =मैं इस कार्य को नहीं करूँगाबालिशः =मूर्ख
जीवन्मुक्तः =ज्ञानीन भवेत् =नहीं होता है अर्थात् मोह को नहीं प्राप्त होता है
कुरुते =कार्य को करता हैअतएव =इसी लिये
संसरन् =व्यवहार को करता हुआ