भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

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पृष्ठ 323

३१६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

पदच्छेदः ।

भावस्य, भावकः, कश्चित्, न, किञ्चित्, भावकः, अपरः, उभयाऽभावकः, कश्चित्, एवम्, एव, निराकुलः ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
कश्चित्=कोईभावकः=माननेवाला है
भावस्य=भाव काएवम् एव=वैसा ही
भावकः=माननेवाला हैकश्चित्=कोई
अपरः=और कोई$\left.\begin{aligned} उभया- \ ऽभावकः \end{aligned} \right} =\begin{aligned} &दोनों अर्थात् भाव \ &और अभाव का नहीं \ &माननेवाला \end{aligned}$
किञ्चित्=कुछ भी
=नहीं है
एवम्=ऐसानिराकुलः=स्वस्थ चित्त है ॥

भावार्थ ।

अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे राजन् ! कोई एक नैयायिक ऐसा मानता है कि भाव-रूप प्रपञ्च परमार्थ से सत्य है । और कोई शून्य वादी कहता है कि सब प्रपञ्च शून्य-रूप है, क्योंकि शून्य ही से उसकी उत्पत्ति होती है । और हजारों में से कोई एक आत्मा का अनुभव करनेवाला होता है । वह भाव और अभाव दोनों की भावना का त्याग करके और स्वस्थचित्त होकर अपने आत्मानन्द में ही सदा मग्न रहता है ॥ ४२ ॥

मूलम् ।

शुद्धमद्वयमात्मानं भावयन्ति कुबुद्धयः । न तु जानन्ति संमोहाद्यावज्जीवमनिर्वृताः ॥ ४३ ॥