अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 324, कुल 405 में से
संदर्भ में पढ़ेंअठारहवाँ प्रकरण । ३१७
पदच्छेदः । शुद्धम्, अद्वयम्, आत्मानम्, भावयन्ति, कुबुद्धयः, न, तु, जानन्ति, संमोहात्, यावज्जीवम्, अनिवृत्ताः ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| कुबुद्धयः | दुर्बुद्धि पुरुष | संमोहात् | अज्ञानता के कारण |
| शुद्धम् | शुद्ध | न जानन्ति | नहीं जानते हैं |
| अद्वयम् | अद्वैत | अतः | इसलिये |
| आत्मानम् | आत्मा को | यावज्जीवम् | जब तक उनका जीवन है |
| भावयन्ति | भावना करते हैं | अनिवृत्ताः | संतोष-रहित हैं ॥ |
| तु | परन्तु |
भावार्थ । अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! अज्ञानी मूढ़ शुद्ध निर्मल द्वैत से रहित व्यापक आत्मा का अनुभव नहीं करते हैं, क्योंकि उनका मोह सांसारिक पदार्थों से निवृत्त नहीं हुआ है । इसी कारण उनको आत्मा का साक्षात्कार नहीं होता है । जब तक वे जीते हैं, सन्तोष को कदापि नहीं प्राप्त होते हैं । आत्मा के साक्षात्कार होने के विना सन्तोष की प्राप्ति नहीं हो सकती है ॥ ४३ ॥
मूलम् । मुमुक्षोर्बुद्धिरालम्बमन्तरेण न विद्यते । निरालम्बैव निष्कामा बुद्धिर्मुक्तस्य सर्वदा ॥ ४४ ॥
पदच्छेदः । मुमुक्षोः, बुद्धिः, आलम्बम्, अन्तरेण, न, विद्यते, निरा- लम्बा, एव, निष्कामा, बुद्धिः, मुक्तस्य, सर्वदा ॥