अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
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३१८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| मुमुक्षोः = | मुमुक्षु पुरुष की | सर्वदा = | सब काल में |
| बुद्धिः = | बुद्धि | निष्कामा = | कामना-रहित |
| आलम्बम् अन्तरेण = | आलम्ब के बिना | च = | और |
| न विद्यते = | नहीं रहती है | निरालम्बा = | आश्रय-रहित |
| मुक्तस्य = | मुक्त पुरुष की | एव = | निश्चय करके |
| बुद्धिः = | बुद्धि | विद्यते = | रहती है ॥ |
भावार्थ ।
जिसको आत्मा का साक्षात्कार नहीं हुआ है, उसकी बुद्धि सांसारिक विषय का आलम्बन करती है । और जो निष्काम जीवन्मुक्त है, उसकी बुद्धि आत्मा के आश्रय रहती है । आत्मा के अचल होने से वह बुद्धि भी सदैव स्थिर रहती है ॥ ४४ ॥
मूलम् ।
विषयद्वीपिनो वीक्ष्य चकिताः शरणार्थिनः ।
विशन्ति झटिति क्रोडन्निरोधैकाग्रयसिद्धये ॥ ४५ ॥
पदच्छेदः ।
विषयद्वीपिनः, वीक्ष्य, चकिताः, शरणार्थिनः, विशन्ति, झटिति, क्रोडम्, निरोधैकाग्रयसिद्धये ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| विषयद्वीपिनः = | विषय-रूपी व्याघ्र को | शरणार्थिनः = | अपने शरीर की रक्षा करनेवाले मूढ़ पुरुष |
| वीक्ष्य = | देख करके | ||
| चकिताः = | डरे हुए |