अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
पृष्ठ 322, कुल 405 में से
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अठारहवां प्रकरण । ३१५
पदच्छेदः । क्व, निरोधः, विमूढस्य, यः, निर्बन्धम्, करोति, वै, स्वरामस्य, एव, धीरस्य, सर्वदा, असौ, अकृत्रिमः ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| यः | =जो | स्वरामस्य | =आत्माराम |
| निर्बन्धम् | =चित्त के निरोध को | धीरस्य | =ज्ञानी को |
| वै | =हठ करके | सर्वदां | =सदैव |
| करोति | =करता है | एव | =निश्चय करके |
| तस्य | =उस | असौ | =यह |
| विमूढस्य | =अज्ञानी को | चित्तनिरोधः | =चित्त का निरोध |
| क्व | =कहाँ | अकृत्रिमः | =स्वाभाविक है ॥ |
| निरोधः | =चित्त का निरोध है |
भावार्थ । जो अज्ञानी पुरुष शुष्कचित्त के निरोध में हठ करता है, उसका चित्त कभी निरोध को नहीं प्राप्त होता है । अज्ञानी ही चित्त के निरोध के लिये समाधि लगाता है । जब वह समाधि से उत्थान करता है, तब फिर उसका चित्त संसार के पदार्थों में फैल जाता है । और जो आत्मा में स्मरण करनेवाला योगी है, जिसका चित्त निश्चल है, उसका चित्त सर्वदा आत्मा में ही निरुद्ध रहता है, इसी कारण सर्वदा उसकी समाधि बनी रहती है ॥ ४१ ॥
मूलम् । भावस्य भावकः कश्चिन्न किञ्चिद्भावकोऽपरः । उभयाऽभावकः कश्चिदेवमेव निराकुलः ॥ ४२ ॥