अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
पृष्ठ 321, कुल 405 में से
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३१४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
पदच्छेदः ।
क्व, आत्मनः, दर्शनम्, तस्य, यत्, दृष्टम्, अवलम्बते, धीराः, तम्, तम्, न, पश्यन्ति, पश्यन्ति, आत्मानम्, अव्ययम् ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| तस्य=उसको | धीराः=ज्ञानी |
| आत्मनः=आत्मा का | तम् तम्=उस |
| दर्शनम्=दर्शन | दृष्टम्=दृष्ट को |
| क्व=कहाँ है | न पश्यन्ति=नहीं देखते हैं |
| यत्=जो | परन्तु=परन्तु |
| दृष्टम्=दृष्ट को | अव्ययम्=अविनाशी |
| अवलम्बते=अवलम्बन करता है | आत्मानम्=आत्मा को |
| पश्यन्ति=देखते हैं ॥ |
भावार्थ ।
जो अज्ञानी पुरुष है, वह प्रत्यक्ष प्रमाणों करके ही जाने हुए पदार्थों को सत्य-रूप करके मानता है, इसी कारण उसको आत्म-दर्शन कदापि नहीं प्राप्त होता है। और जो ज्ञानी है, वह देखते हुए पदार्थों को नहीं देखता है। किन्तु उनके अन्तर्गत कारण-शक्ति सर्वत्र चिद्रूप आत्मा को ही देखता है, इसी कारण वह परमात्मा में सदा लीन रहता है, और कार्य-रूपी बाह्य पदार्थ उसको कोई भी दिखाई नहीं देता है ॥ ४० ॥
मूलम् ।
क्व निरोधो विमूढस्य यो निर्बन्धं करोति वै । स्वारामस्यैव धीरस्य सर्वदाऽसावकृत्रिमः ॥ ४१ ॥