अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
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अठारहवाँ प्रकरण । ३१३
मूलम् ।
न शान्तिं लभते मूढो यतः शमितुमिच्छति । धीरस्तत्त्वं विनिश्चित्यसर्वदा शान्तमानसः ॥ ३९ ॥
पदच्छेदः ।
न, शान्तिम्, लभते, मूढः, यतः, शमितुम्, इच्छति, धीरः, तत्त्वम्, विनिश्चित्य, सर्वदा, शान्तमानसः ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| यतः=जिस कारण | न लभते=नहीं प्राप्त होता है |
| शमितुम्=शान्त होने को | धीरः=ज्ञानी |
| मूढः=अज्ञानी | तत्त्वम्=तत्त्व को |
| इच्छति=इच्छा करता है | विनिश्चित्य=निश्चय करके |
| ततः=इसी कारण | सर्वदा=सर्वदा |
| सः=वह | शान्तमानसः=शान्त मनवाला है ॥ |
| शान्तिम्=शान्ति को |
भावार्थ ।
अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! मूढ़ अज्ञानी जिस हेतु चित्त के निरोध से शान्ति की इच्छा करता है, इसी वास्ते वह शान्ति को नहीं प्राप्त होता है । धीर जो है सो आत्मतत्त्व को निश्चय करके शान्ति की इच्छा नहीं करता है, इसी लिये शान्ति को प्राप्त होता है ॥ ३९ ॥
मूलम् ।
क्वात्मनो दर्शनं तस्य यद्दृष्टमवलम्बते । धीरास्तंतं पश्यन्ति पश्यन्त्यात्मानमव्ययम् ॥ ४० ॥