भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

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२९८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
प्रकृत्या =स्वभाव सेधीरस्य =ज्ञानी को
यदृच्छया =प्रारब्ध करकेन =
प्राकृतस्य =अज्ञानी कीमानः =मान है
इव =तरहच =और
कुर्वतः =करता हुआन =
अस्य =इसअवमानता =अपमान है ॥
शून्यचित्तस्य =विकार रहित चित्तवाले

भावार्थ ।

स्वभाव से ही जिसका चित्त शून्य है, अर्थात् विकार से रहित है, कदापि विकारी नहीं होता है । आत्मा में ही जो शान्ति को प्राप्त हुआ है, ऐसा जो ज्ञानवान् पुरुष है, व अज्ञानी की तरह प्रारब्धवश से चेष्टा को करता हुआ भी हर्ष और शोक को नहीं प्राप्त होता है । अपने मान-अपमान का भी उसका अनुसंधान नहीं है ॥ २४ ॥

अब ज्ञानी के अनुभव को दिखाते हैं—

मूलम् ।

कृतं देहेन कर्मेदं न मया शुद्धरूपिणा ।
इति चिन्तानुरोधी यः कुर्वन्नपि करोति न ॥ २५ ॥

पदच्छेदः ।

कृतम्, देहेन, कर्म, इदम्, न, मया, शुद्धरूपिणा, इति, चिन्तानुरोधी, यः, कुर्वन्, अपि, करोति, न ॥