अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
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२९८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| प्रकृत्या = | स्वभाव से | धीरस्य = | ज्ञानी को |
| यदृच्छया = | प्रारब्ध करके | न = | न |
| प्राकृतस्य = | अज्ञानी की | मानः = | मान है |
| इव = | तरह | च = | और |
| कुर्वतः = | करता हुआ | न = | न |
| अस्य = | इस | अवमानता = | अपमान है ॥ |
| शून्यचित्तस्य = | विकार रहित चित्तवाले |
भावार्थ ।
स्वभाव से ही जिसका चित्त शून्य है, अर्थात् विकार से रहित है, कदापि विकारी नहीं होता है । आत्मा में ही जो शान्ति को प्राप्त हुआ है, ऐसा जो ज्ञानवान् पुरुष है, व अज्ञानी की तरह प्रारब्धवश से चेष्टा को करता हुआ भी हर्ष और शोक को नहीं प्राप्त होता है । अपने मान-अपमान का भी उसका अनुसंधान नहीं है ॥ २४ ॥
अब ज्ञानी के अनुभव को दिखाते हैं—
मूलम् ।
कृतं देहेन कर्मेदं न मया शुद्धरूपिणा ।
इति चिन्तानुरोधी यः कुर्वन्नपि करोति न ॥ २५ ॥
पदच्छेदः ।
कृतम्, देहेन, कर्म, इदम्, न, मया, शुद्धरूपिणा, इति, चिन्तानुरोधी, यः, कुर्वन्, अपि, करोति, न ॥