भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

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अठारहवाँ प्रकरण । २९७

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
आत्मारामस्य =आत्मा में रमण करनेवालेजिहासा =त्याग की इच्छा
अस्ति =है
शीतलाच्छत-रात्मनः =शीतल और अति निर्मल चित्तवालेवा अपि =और
न =
धीरस्य =ज्ञानी कोकुत्रचित् =कहीं
न =आशा =ग्रहण की इच्छा
कुत्र अपि =कहींअस्ति =है ॥

भावार्थ ।

हे शिष्य ! अपने आत्मा में ही जो नित्य रमण करने-वाला है, उसका चित्त भी स्थिर रहता है । उसकी इच्छा किसी पदार्थ के ग्रहण और त्याग में नहीं रहती है और न वह अनर्थ को करता है, क्योंकि अनर्थ का हेतु उसमें बाकी नहीं रहा है ॥ २३ ॥

मूलम् ।

प्रकृत्या शून्यचित्तस्य कुर्वतोऽस्य यदृच्छया ।
प्राकृतस्येव धीरस्य न मानो नावमानता ॥ २४ ॥

पदच्छेदः ।

प्रकृत्या, शून्यचित्तस्य, कुर्वतः, अस्य, यदृच्छया, प्राकृतस्य, इव, धीरस्य, न मानः, न, अवमानता ॥