भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

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२९६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
असंसारस्य=ज्ञानी कोविषादता=शोक है
न=नसः=वह
तु=तोशीतलमना=शान्त मनवाला
क्व अपि=कभीनित्यम्=सदा
हर्षः=हर्ष हैविदेहःइव=मुक्त की तरह
च=औरराजते=शोभायमान रहता है ॥
न=न

भावार्थ ।

अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! ज्ञानी संसार से रहित है । संसार का हेतु अर्थात् कारण अज्ञान जिसमें न रहे, उसी का नाम असंसारी है और हर्ष विषादादि भी उसमें नहीं उत्पन्न होते हैं, इसी से वह शीतल हृदय है और विदेहमुक्त की तरह वह रहता है ॥ २२ ॥

मूलम् ।

कुत्रापि न जिहासाऽस्ति आशा वाऽपि न कुत्रचित् ।
आत्मारामस्य धीरस्य शीतलाच्छतरात्मनः ॥ २३ ॥

पदच्छेदः ।

कुत्र, अपि, न, जिहासा, अस्ति, आशा, वा, अपि, न, कुत्रचित्, आत्मारामस्य, धीरस्य, शीतलाच्छतरात्मनः ॥