अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 302, कुल 405 में से
संदर्भ में पढ़ेंअठारहवाँ प्रकरण । २९५
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| निर्वासनः = | वासना-रहित | संसारवातेन = | प्रारब्ध-रूपीपवन करके |
| निरालम्बः = | आलम्ब-रहित | ||
| स्वच्छन्दः = | स्वेच्छाचारी | क्षिप्तः = | प्रेरणा किया हुआ |
| मुक्तबन्धनः = | बन्धन-रहित | शुष्कपर्णवत् = | सूखे पत्ते की तरह |
| ज्ञानिनः = | ज्ञानी | चेष्टते = | चेष्टा करता है |
भावार्थ ।
**प्रश्न—**यदि ज्ञानी निर्वासनिक है, तब वह किस करके प्रेरणा किया हुआ कर्मों को करता है ।
**उत्तर—**ज्ञानी जिस हेतु करके निर्वासनिक है, उसी हेतु करके वह निरालम्ब भी है; अर्थात् कर्त्तव्यता का जो अनु-संधान अर्थात् चिन्तन है, उससे वह रहित है, और स्वच्छन्द भी है अर्थात् वह राग-द्वेषादिकों के अधीन है । और बन्ध का हेतु जो अज्ञान है, उससे रहित है । जैसे सूखा पत्ता वायु करके प्रेरा हुआ इधर-उधर डोलता है, वैसे ही ज्ञानी प्रारब्ध-रूपी वायु करके चलाया हुआ इधर-उधर फिरता है ॥ २१ ॥
मूलम् ।
असंसारस्य तु क्वापि न हर्षो न विषादता । स शीतलमना नित्यं विदेह इव राजते ॥ २२ ॥
पदच्छेदः ।
असंसारस्य, तु, क्व, अपि, न, हर्ष, न, विषादता, सः, शीतलमनः, नित्यम्, विदेहः, इव, राजते ॥