भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

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पहला प्रकरण । ३३

पदच्छेदः । देहाभिमानपाशेन, चिरम्, बद्धः, असि, पुत्रक, बोधः, अहम्, ज्ञानखड्गेन, तत्, निष्कृत्य, सुखीभव ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
पुत्रक=हे पुत्र !बोधः=बोध-रूप हूँ
देहाभिमान- पाशेन=$देह के अभिमान-रूपी पाश सेइति=ऐसे
ज्ञानखड्गेन=ज्ञान-रूपी तलवार से
चिरम्=बहुत काल कातत्=उसको यानी उस रस्सीको
बद्धः=बँधा हुआनिष्कृत्य=काट करके
असि=तू हैत्वम्=तू
अहम्=मैंसुखीभव=सुखी हो ॥

भावार्थ । हे जनक ! “देहोऽहम्” मैं देह हूँ—इस प्रकार के अभिमान करके तू चिरकाल से बन्धायमान हो रहा है अर्थात् अपने को संसार-बंध में डाल रहा है, अब तू आत्म-ज्ञान-रूपी खङ्ग से उसका छेदन करके, ‘मैं ज्ञान-स्वरूप हूँ’, ‘नित्य-मुक्त हूँ’—ऐसा निश्चय करके सुखी हो, क्योंकि तेरे में बन्धन तीनों काल में नहीं है ॥१४॥

जनकजी फिर पूछते हैं कि हे भगवन् ! पतंजलिजी के मतानुयायी चित्त-वृत्ति के निरोध-रूप योग को ही बंध की निवृत्त का हेतु मानते हैं, सो उनका मानना ठीक है या नहीं ?

मूलम् । निःसंगो निष्क्रियोऽसि त्वं स्वप्रकाशो निरञ्जनः । अयमेव हि ते बन्धः समाधिमनुतिष्ठसि ॥ १५ ॥