अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 41, कुल 405 में से
संदर्भ में पढ़ें३४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
पदच्छेदः । निःसंगः, निष्क्रियः, असि, त्वम्, स्वप्रकाशः, निरञ्जनः, अयम्, एव, हि, ते, बन्धः, समाधिम्, अनुतिष्ठसि ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| त्वम् = तू | ते = तेरा |
| निःसंगः = संग-रहित है | बन्धः = बंधन है |
| निष्क्रियः = क्रिया-रहित है | हि = जो |
| स्वप्रकाशः = स्वयं प्रकाश-रूप है | समाधिम् = समाधि को |
| निरञ्जनः = निर्दोष है | अनुतिष्ठसि = अनुष्ठान करता है । |
| अयम्एव = यही |
भावार्थ । अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! तू निःसंग है अर्थात् सबके सम्बन्ध से तू रहित है और क्रिया से भी तू रहित है । सम्बन्ध से रहित और क्रिया से रहित आत्माकी प्राप्ति के लिये जो समाधि का अनुष्ठान करना है, उसी का नाम बन्ध है । जो स्वप्रकाश आत्मा का ध्यान, जड़-वृत्ति का निरोध करके करता है, उससे बढ़कर और कोई बन्ध नहीं है, और न कोई अज्ञान है । आत्मा के स्वरूप के ज्ञान से भिन्न, जितने मुक्ति के उपाय कहे गए हैं, वे सब बंध के ही कारण हैं, किन्तु सब बन्ध-रूप ही हैं ॥ १५ ॥
अब अष्टावक्रजी जनक की विपरीति बुद्धि के दूर करने के निमित्त उपदेश करते हैं—
मूलम् । त्वया व्याप्तमिदं विश्वं त्वयि प्रोतं यथार्थतः । शुद्धबुद्धस्वरूपस्त्वं मागमः क्षुद्रचित्तताम् ॥ १६ ॥