भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

पृष्ठ 42, कुल 405 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 42

पहला प्रकरण । ३५

पदच्छेदः । त्वया, व्याप्तम्, इदम्, विश्वम्, त्वयि, प्रोतम्, यथार्थतः, शुद्धबुद्धस्वरूपः, त्वम्, मागमः, क्षुद्रचित्तताम् ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
इदम्=यहत्वम्=तू
विश्वम्=संसारयथार्थतः=परमार्थ से
त्वया=तुझ करकेशुद्धबुद्ध-स्वरूपः} =शुद्ध चैतन्य-स्वरूप है
व्याप्तम्=व्याप्त हैक्षुद्रचित्तताम्} =विपरीत चित्त-वृत्ति को
त्वयि=तुझी मेंमागमः=मत प्राप्त हो ।
प्रोतम्=पिरोया है

भावार्थ । हे जनक ! जैसे स्वर्ण करके कंकणादिक व्याप्त हैं और मृत्तिका करके जैसे घटादिक व्याप्त हैं, वैसे यह सारा जगत् तुझे चेतन करके व्याप्त है और जैसे माला के सूत में दाने सब पिरोये हुए रहते हैं, वैसे यह सारा जगत् तेरे चेतन-रूप तागे करके पिरोया हुआ है । जैसे मिथ्या रजत शुक्ति की सत्ता करके सत्यवत् प्रतीत होती है—वास्तव में वह सत्य नहीं है, वैसे चेतन की सत्ता करके जगत् सत्य की तरह प्रतीत होता है—वास्तव में जगत् सत्य नहीं है । जगत् की अपनी सत्ता कुछ भी नहीं है, किन्तु तेरे संकल्प से यह जगत् उत्पन्न हुआ है, और तेरे संकल्प के निवृत्त होने से यह जगत् भी निवृत्त हो जावेगा । तू अपने शुद्ध-स्वरूप में स्थित हो, और क्षुद्रता को मत प्राप्त हो । मन्दालसा ने भी अपने पुत्रों को यही उपदेश करके संसार-बंधन से छुड़ा दिया था—