भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

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३६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

शुद्धोऽसि बुद्धोऽसि निरञ्जनोऽसि संसारमायापरिवर्जितोऽसि । संसारस्वप्नस्त्यज मोहनिद्रां मग्दालसा वाक्यमुवाच पुत्रम् ॥१॥

अर्थात् हे तात ! तू शुद्ध है, ज्ञान-स्वरूप है, माया-मल से तू रहित है, तू संसार-रूपी असत् माया नहीं है, संसार-रूपी स्वप्न मोह-रूपी निद्रा करके प्रतीत हो रहा है, इसको तू त्याग दे । इस प्रकार माता के उपदेश से वे जीवनमुक्त हो गये । हे जनक ! तू भी ऐसा विचार करके संसार में जीवन्मुक्त होकर विचर ॥ १६ ॥

मूलम् । निरपेक्षो निर्विकारो निर्भरः शीतलाशयः । अगाधबुद्धिरक्षुब्धो भव चिन्मात्रवासनः ॥ १७ ॥

पदच्छेदः । निरपेक्षः, निर्विकारः, निर्भरः, शीतलाशयः, अगाधबुद्धिः, अक्षुब्ध, भव, चिन्मात्रवासनः ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
त्वम्=तू$\left.\begin{matrix}अगाध \ बुद्धिः\end{matrix}\right}$=अगाध चैतन्य बुद्धिरूप है
निरपेक्षः=अपेक्षा रहित हैअक्षुब्धः=$\left{\begin{matrix}अविद्या के क्षोभ \ से रहित है\end{matrix}\right.$
निर्विकारः=विकार-रहित है$\left.\begin{matrix}चिन्मात्र- \ वासनः\end{matrix}\right}$=चैतन्य मात्र में
निर्भरः=चिद्घन-रूप हैभव=निष्ठावाला हो ।
शीतलाशयः=$\left{\begin{matrix}शान्ति और मुक्ति \ का स्थान है\end{matrix}\right.$

भावार्थ । अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! निरपेक्ष हो अर्थात् षडूर्िमयों से रहित हो ।