अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 43, कुल 405 में से
संदर्भ में पढ़ें३६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
शुद्धोऽसि बुद्धोऽसि निरञ्जनोऽसि संसारमायापरिवर्जितोऽसि । संसारस्वप्नस्त्यज मोहनिद्रां मग्दालसा वाक्यमुवाच पुत्रम् ॥१॥
अर्थात् हे तात ! तू शुद्ध है, ज्ञान-स्वरूप है, माया-मल से तू रहित है, तू संसार-रूपी असत् माया नहीं है, संसार-रूपी स्वप्न मोह-रूपी निद्रा करके प्रतीत हो रहा है, इसको तू त्याग दे । इस प्रकार माता के उपदेश से वे जीवनमुक्त हो गये । हे जनक ! तू भी ऐसा विचार करके संसार में जीवन्मुक्त होकर विचर ॥ १६ ॥
मूलम् । निरपेक्षो निर्विकारो निर्भरः शीतलाशयः । अगाधबुद्धिरक्षुब्धो भव चिन्मात्रवासनः ॥ १७ ॥
पदच्छेदः । निरपेक्षः, निर्विकारः, निर्भरः, शीतलाशयः, अगाधबुद्धिः, अक्षुब्ध, भव, चिन्मात्रवासनः ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| त्वम्= | तू | $\left.\begin{matrix}अगाध \ बुद्धिः\end{matrix}\right}$ | =अगाध चैतन्य बुद्धिरूप है |
| निरपेक्षः= | अपेक्षा रहित है | अक्षुब्धः= | $\left{\begin{matrix}अविद्या के क्षोभ \ से रहित है\end{matrix}\right.$ |
| निर्विकारः= | विकार-रहित है | $\left.\begin{matrix}चिन्मात्र- \ वासनः\end{matrix}\right}$ | =चैतन्य मात्र में |
| निर्भरः= | चिद्घन-रूप है | भव= | निष्ठावाला हो । |
| शीतलाशयः= | $\left{\begin{matrix}शान्ति और मुक्ति \ का स्थान है\end{matrix}\right.$ |
भावार्थ । अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! निरपेक्ष हो अर्थात् षडूर्िमयों से रहित हो ।