अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पहला प्रकरण । ३५
पदच्छेदः । त्वया, व्याप्तम्, इदम्, विश्वम्, त्वयि, प्रोतम्, यथार्थतः, शुद्धबुद्धस्वरूपः, त्वम्, मागमः, क्षुद्रचित्तताम् ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| इदम् | =यह | त्वम् | =तू |
| विश्वम् | =संसार | यथार्थतः | =परमार्थ से |
| त्वया | =तुझ करके | शुद्धबुद्ध-स्वरूपः | } =शुद्ध चैतन्य-स्वरूप है |
| व्याप्तम् | =व्याप्त है | क्षुद्रचित्तताम् | } =विपरीत चित्त-वृत्ति को |
| त्वयि | =तुझी में | मागमः | =मत प्राप्त हो । |
| प्रोतम् | =पिरोया है |
भावार्थ । हे जनक ! जैसे स्वर्ण करके कंकणादिक व्याप्त हैं और मृत्तिका करके जैसे घटादिक व्याप्त हैं, वैसे यह सारा जगत् तुझे चेतन करके व्याप्त है और जैसे माला के सूत में दाने सब पिरोये हुए रहते हैं, वैसे यह सारा जगत् तेरे चेतन-रूप तागे करके पिरोया हुआ है । जैसे मिथ्या रजत शुक्ति की सत्ता करके सत्यवत् प्रतीत होती है—वास्तव में वह सत्य नहीं है, वैसे चेतन की सत्ता करके जगत् सत्य की तरह प्रतीत होता है—वास्तव में जगत् सत्य नहीं है । जगत् की अपनी सत्ता कुछ भी नहीं है, किन्तु तेरे संकल्प से यह जगत् उत्पन्न हुआ है, और तेरे संकल्प के निवृत्त होने से यह जगत् भी निवृत्त हो जावेगा । तू अपने शुद्ध-स्वरूप में स्थित हो, और क्षुद्रता को मत प्राप्त हो । मन्दालसा ने भी अपने पुत्रों को यही उपदेश करके संसार-बंधन से छुड़ा दिया था—
३६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
शुद्धोऽसि बुद्धोऽसि निरञ्जनोऽसि संसारमायापरिवर्जितोऽसि । संसारस्वप्नस्त्यज मोहनिद्रां मग्दालसा वाक्यमुवाच पुत्रम् ॥१॥
अर्थात् हे तात ! तू शुद्ध है, ज्ञान-स्वरूप है, माया-मल से तू रहित है, तू संसार-रूपी असत् माया नहीं है, संसार-रूपी स्वप्न मोह-रूपी निद्रा करके प्रतीत हो रहा है, इसको तू त्याग दे । इस प्रकार माता के उपदेश से वे जीवनमुक्त हो गये । हे जनक ! तू भी ऐसा विचार करके संसार में जीवन्मुक्त होकर विचर ॥ १६ ॥
मूलम् । निरपेक्षो निर्विकारो निर्भरः शीतलाशयः । अगाधबुद्धिरक्षुब्धो भव चिन्मात्रवासनः ॥ १७ ॥
पदच्छेदः । निरपेक्षः, निर्विकारः, निर्भरः, शीतलाशयः, अगाधबुद्धिः, अक्षुब्ध, भव, चिन्मात्रवासनः ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| त्वम्= | तू | $\left.\begin{matrix}अगाध \ बुद्धिः\end{matrix}\right}$ | =अगाध चैतन्य बुद्धिरूप है |
| निरपेक्षः= | अपेक्षा रहित है | अक्षुब्धः= | $\left{\begin{matrix}अविद्या के क्षोभ \ से रहित है\end{matrix}\right.$ |
| निर्विकारः= | विकार-रहित है | $\left.\begin{matrix}चिन्मात्र- \ वासनः\end{matrix}\right}$ | =चैतन्य मात्र में |
| निर्भरः= | चिद्घन-रूप है | भव= | निष्ठावाला हो । |
| शीतलाशयः= | $\left{\begin{matrix}शान्ति और मुक्ति \ का स्थान है\end{matrix}\right.$ |
भावार्थ । अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! निरपेक्ष हो अर्थात् षडूर्िमयों से रहित हो ।
पहला प्रकरण । ३७
१-भूख, २-प्यास, ३-शोक, ४-मोह, ५-जन्म, ६-मरण इन छहों का नाम षट्ऊर्मि है। इनमें से भूख और प्यास ये दो प्राण के धर्म हैं। शोक और मोह ये दो मन के धर्म हैं। जन्म और मरण ये दो सूक्ष्म-देह के धर्म हैं। तुझ आत्मा के धर्म ये कोई नहीं—
जायते, अस्ति, वर्धते, विपरिणमते, अपक्षीयते, विनश्यति ।
अर्थात् जो उत्पन्न होता है, स्थित है, बढ़ता है, परिणाम को प्राप्त होता है, क्षण-क्षण में क्षीण होता है और नाश हो जाता है, ये षट्भाव-विकार स्थूल देह के धर्म हैं, तुझ आत्मा के धर्म नहीं हैं, क्योंकि तू सूक्ष्म देह से और स्थूल-देह से परे है, और इन दोनों का द्रष्टा है, इसी से तू निर्विकार है, सच्चिदानन्द रूप है, शीतल है अर्थात् सुख-रूप है अगाध बुद्धिवाला है, अक्षुब्ध है अर्थात् अविद्याकृत क्षोभ से रहित है, अतएव तू क्रिया से रहित होकर चैतन्य-स्वरूप में निष्ठावाला है ॥ १७ ॥
अष्टावक्रजी ने उत्थान का दूसरे श्लोक में जनकजी को मोक्ष का उपाय इस प्रकार उपदेश किया कि विषयों को तू विष के तुल्य त्याग कर, और सत्य को तू अमृत के तुल्य पान कर, परन्तु विषयों की ओर विष की तुल्यता में, और सत्य-रूप आत्मा की ओर अमृत की तुल्यता में कोई भी हेतु नहीं कहा, अतः आगे उसको कहते हैं।
मूलम् । साकारमनृतं विद्धि निराकारं तु निश्चलम् । एतत्तत्त्वोपदेशेन न पुनर्भवसम्भवः ॥ १८ ॥
३८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
पदच्छेदः ।
साकारम्, अनृतम्, विद्धि, निराकारम्, तु, निश्चलम्, एतत्तत्त्वोपदेशेन, न, पुनः, भवसम्भवः ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| साकारम् = | शरीरादिकों को | $\left.\begin{matrix} एतत्तत्त्वो- \ पदेशेन \end{matrix}\right}$ = | इस यथार्थ उपदेश से |
| अनृतम् = | मिथ्या | पुनः = | फिर |
| विद्धि = | जान | भवसम्भवः = | संसार में उत्पत्ति |
| निराकारम् = | निराकार आत्म-तत्त्व की | न = | नहीं |
| निश्चलम् = | निश्चल नित्य | भवति = | होती है |
| विद्धि = | जान |
भावार्थ ।
हे जनक ! साकार जो शरीरादिक हैं, उनको तू मिथ्या जान । जो मिथ्या होकर बन्ध का हेतु होता है, वही विष के योग्य त्यागने योग्य भी होता है । इसी में एक दृष्टान्त कहते हैं—
एक बनिये के घर में लड़का नहीं होता था । एक दिन रात्रि के समय वह पलँग पर अपनी स्त्री के साथ सो रहा था । उसकी स्त्री ने उस बनिये से कहा कि यदि परमेश्वर हमको एक लड़का दे देवे, तब उसको कहाँ पर सुलावेंगे । बनिया थोड़ा सा पीछे हटा और कहा कि उस लड़के को यहाँ बीच में सुलावेंगे । फिर स्त्री ने कहा कि यदि एक और हो जावे, तब उसको कहाँ पर सुलावेंगे । वह थोड़ासा और पीछे हटकर कहने लगा कि उसको भी बीच में सुलावेंगे । फिर स्त्री ने कहा कि यदि एक और हो जावे, तब उसको कहाँ सुलावेंगे । फिर पीछे हटकर यह कहता ही था कि
पहला प्रकरण । ३९
इतने में नीचे गिर पड़ा और उसकी टाँग टूट गई और हाय, हाय करके रोने लगा । तब इधर-उधर से पड़ोस के लोग आकर पूछने लगे कि क्या हुआ, कैसे टाँग तेरी टूट गई । तब बनिये ने कहा कि बिना हुए, मिथ्या लड़के ने मेरी टाँग तोड़ दी । यदि सच्चा होता, तब न जाने क्या अनर्थ करता, वैसे ही साकार जितने स्त्री पुरुषादिक विषय हैं, वे सब दुःख के हेतु हैं, ये विष के तुल्य त्यागने योग्य हैं । हे जनक ! जो निराकार आत्मतत्त्व है, वह निश्चल है और नित्य है । श्रुति भी ऐसा ही कहती है—
“नित्यं विज्ञानमानन्दं ब्रह्म”
अर्थात् आत्मा नित्य, विज्ञान और आनन्दस्वरूप है,
उसी आत्म-तत्त्व में स्थिरता को पाकर हे जनक ! फिर तू जन्म-मरण रूपी संसार को नहीं प्राप्त होवेगा ॥ १८ ॥
अब अष्टावक्रजी वर्णाश्रमी धर्मवाले स्थूल शरीर से और
धर्माऽधर्म-रूपी संस्कारवाले लिंग-शरीर से विलक्षण, परिपूर्ण चैतन्य-स्वरूप आत्मा को दृष्टान्त के सहित कहते हैं ।
मूलम् ।
यथैवादर्शमध्यस्थे रूपेन्तः परितस्तु सः । तथैवास्मिञ्छरीरेऽन्तः परितः परमेश्वरः ॥ १९ ॥
पदच्छेदः ।
यथा, एव, आदर्शमध्यस्थे, रूपे, अन्तः, परितः, तु, सः, तथा, एव, अस्मिन्, शरीरे, अन्तः, परितः, परमेश्वरः ॥
४० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| यथा= | जैसे | भासते= | भासता है |
| एव= | निश्चय करके | तथा एव= | वैसे ही |
| आदर्श- मध्यस्थे | दर्पण के मध्य में स्थित हुए | अस्मिन्= शरीरे | इस शरीर में |
| रूपे= | प्रतिबिम्ब में | अन्तः परितः= | भीतर और बाहर से |
| सः= | वह शरीर | परमेश्वरः= | परमेश्वर भासता है ॥ |
भावार्थ ।
हे जनक ! जैसे दर्पण में प्रतिबिम्ब जो शरीरादिक हैं, उनके अन्तर, मध्य और बाहर, चारों तरफ दर्पण व्याप्त हो करके वर्तता है अर्थात् वह प्रतिबिम्ब अध्यस्त है, अर्थात् दर्पण में देखने-मात्र का है, स्वरूप से सत्य नहीं है, वैसे ही अपने आत्मा में अध्यस्त जो शरीर है, उसके भीतर, बाहर, मध्य और सर्व ओर चेतन आत्मा ही व्याप्त करके स्थित है । हे राजन् ! कल्पित पदार्थ की अधिष्ठान से भिन्न अपनी सत्ता कुछ भी नहीं होती है, किन्तु अधिष्ठान की सत्ता करके वह सत्यवत् प्रतीत होता है—जैसे शुक्ति में रजत, और दर्पण में प्रतिबिम्ब प्रतीत होता है, वैसे शरीरादिक भी आत्मा में उसी की सत्ता करके सत्य के सदृश प्रतीत होते हैं, वास्तव में ये भी सत्य नहीं हैं, किन्तु मिथ्या हैं ॥ १९ ॥
दर्पण के दृष्टांत से कदाचित् जनक को ऐसा भ्रम हो जावे कि जैसे दर्पण परिच्छिन्न है, वैसे ही आत्मा भी परिच्छिन्न होगा, इस भ्रम के दूर करने के लिये ऋषिजी दूसरा दृष्टांत देते हैं ।
पहला प्रकरण । ४१
मूलम् । एकं सर्वगतं व्योम बहिरन्तर्यथा घटे । नित्यं निरन्तर ब्रह्म सर्वभूतगणे तथा ॥ २० ॥
पदच्छेदः । एकम्, सर्वगतम्, व्योम बहिः, अन्त:, यथा, घटे, नित्यम्, निरन्तर, ब्रह्म, सर्वभूतगणे, तथा ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| यथा | =जैसे | अस्ति | =स्थित है |
| सर्वगतम् | =सर्वगत | तथा | =वैसे ही |
| एकम् | =एक | नित्यम् | =नित्य |
| व्योम | =आकाश | निरन्तरम् | =निरंतर |
| बहिः | =बाहर | ब्रह्म | =ब्रह्म |
| अन्तः | =भीतर | सर्वभूतगणे | =सब भूतों के शरीर में |
| घटे | =घट में | अस्ति | =स्थित है ॥ |
भावार्थ । जैसे सर्वगत एक ही आकाश घटपटादिकों में बाहर, भीतर और मध्य में व्यापक है, वैसे ही नित्य, अविनाशी आत्मा भी संपूर्ण भूतों के गणों में बाहर, भीतर और मध्य में व्यापक है । “एष ते आत्मा सर्वस्यान्तर इति श्रुतेः” यह तेरा ही आत्मा सबके अन्तर व्यापक है, ऐसा जानकर हे जनक ! तू सुखपूर्वक विचर ॥ २० ॥ इति श्रीअष्टावक्रगीतायां प्रथमं प्रकरणं समाप्तम् ।
—:०:—
दूसरा प्रकरण (आश्चर्य / आत्मोल्लास)
दूसरा प्रकरण ।
—:०:—
मूलम् ।
अहो निरञ्जनः शान्तो बोधोऽहं प्रकृतेः परः ।
एतावन्तमहं कालं मोहेनैव विडंबितः ॥१॥
पदच्छेदः ।
अहो निरञ्जनः, शान्तः, बोधः, अहम्, प्रकृतेः, परः, एतावन्तम्, अहम्, कालम्, मोहेन, एव, विडंबितः ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| अहम्= | मैं | अहो= | आश्चर्य है कि |
| निरञ्जनः= | निर्दोष हूँ | अहम्= | मैं |
| शान्तः= | शान्त हूँ | एतावन्तम्= | इतने |
| बोधः= | बोध रूप हूँ | कालम्= | काल पर्यन्त |
| प्रकृते= | प्रकृति से | मोहेन= | अज्ञान करके |
| परः= | परे हूँ | एव= | निःसन्देह |
| विडंबितः= | ठगा गया हूँ |
भावार्थ ।
अष्टावक्रजी के उपदेश से जनक जी को आत्मा का साक्षात्कार जब उदय हुआ, तब जनकजी अपने चेतन स्वरूप आत्मा का साक्षात्कार करके अपने अनुभव को प्रकट करते हुए वाधितानुवृत्ति से पूर्व प्रतीत हुए मोह के स्मरण को बड़े आश्चर्य के साथ प्रकट करते हैं—
मैं निरंजन अर्थात् संपूर्ण उपाधियों से रहित एवं शान्त-स्वरूप होकर, अर्थात् संपूर्ण विकारों से रहित होकर, तथा प्रकृति अर्थात् माया-रूपी अंधकार से भी परे होकर, और
दूसरा प्रकरण । ४३
बोध-स्वरूप अर्थात् ज्ञान-स्वरूप होकर, इतने काल तक देह और आत्मा के अविवेक करके दुःखी होता रहा। आज से हे गुरो ! आपकी कृपा करके मैं आत्मानन्द अनुभव को प्राप्त हुआ हूँ ॥ १ ॥
मूलम् । यथा प्रकाशयाम्येको देहमेनं तथा जगत् । अतो मम जगत्सर्वमथवा न च किंचन ॥ २ ॥
पदच्छेदः । यथा, प्रकाशयामि, एकः, देहम्, एनम्, तथा, जगत्, अतः, मम, जगत्, सर्वम्, अथवा, न च, किञ्चन ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| यथा=जैसे | अन्तः=इसलिये |
| एनम्=इस | मम=मेरा |
| देहम्=देह को | सर्वम्=सम्पूर्ण |
| एकः=अकेला ही | जगत्=संसार है |
| प्रकाशयामि=मैं प्रकाश करता हूँ | अथवा=या |
| तथा=वैसे ही | + मम=मेरा |
| जगत्=संसार को भी | किञ्चन=कुछ भी |
| प्रकाशयामि=प्रकाश करता हूँ | न=नहीं है ॥ |
भावार्थ । पूर्व वाक्य करके जनकजी ने मोह की महिमा को कहा—अब इस वाक्य करके गुरु की कृपा से जो उनको देह और आत्मा का विवेक ज्ञान हुआ है, उसको सहित युक्ति के कथन करते हैं—
४४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
मैं एक ही सारे जगत् को प्रकाश करता हूँ और इस स्थूल देह का भी प्रकाशक हूँ ।
यह देह अनात्मा है यानी जड़ होने से अप्रकाश जगत् की तरह है ।
जड़ देह और चेतन आत्मा का आध्यासिक सम्बन्ध है, अर्थात् कल्पित तादात्म्य सम्बन्ध है । सत्य और मिथ्या का वास्तविक सम्बन्ध न होने से इन दोनों का पारमार्थिक सम्बन्ध नहीं है । जैसे—शुक्ति और रजत का कल्पित तादात्म्य सम्बन्ध है, वैसे देह और आत्मा का भी कल्पित तादात्म्य सम्बन्ध है । जैसे शुक्ति की सत्ता करके रजत् भी सत्यवत् भान होती है, वैसे आत्मा की सत्ता करके देह भी सत्यवत् भान होता है । वास्तव में देह मिथ्या है । इसी तरह आत्मा की सत्ता करके ही सारा जगत् सत्यवत् प्रतीत होता है । आत्मा से पृथक् जगत् मिथ्या है, यानी कभी हुआ नहीं है । इसी वार्त्ता को पञ्चदशीकार ने भी कहा है—
अस्ति भाति प्रियं रूपं नाम चेत्यंशपञ्चकम् । आद्यं त्रयं ब्रह्मरूपं जगद्रूपं ततो द्वयम् ॥ २ ॥
अर्थात् “अस्ति” है “भाति” भान होता है “प्रियम्” प्यारा है, रूप और नाम ये पाँच अंश सारे जगत् में व्याप्त करके रहते हैं और इन पाँचों में से अस्ति, भाति, प्रिय ये तीनों अंश ब्रह्म के हैं, सो तीनों अंश सारे जगत् में प्रवेश होकर स्थित हैं । नाम और रूप ये दो अंश जड़ जगत् के हैं । यदि नाम और रूप को निकाल दिया जावे, तब जगत् की कोई वस्तु भी सत्य नहीं रह सकती है । नाम और रूप
दूसरा प्रकरण । ४५
दोनों विनाशी हैं, क्योंकि एक हालत में नहीं रहते हैं, इसी से सारा जगत् मिथ्या सिद्ध होता है । यह जगत् परब्रह्म के अस्ति, भाति और प्रिय इन तीनों अंशों करके ही सत्यवत् प्रतीत होता है । यदि इन तीनों अंशों को हरएक पदार्थ से पृथक् कर दिया जाय, तब जगत् का कोई भी पदार्थ सत्यवत् भान नहीं हो सकता है । इसी से सिद्ध होता है कि जगत् तीनों कालों में मिथ्या है और ब्रह्म ही तीनों कालों में सत्य है । इस युक्ति-सहित अनुभव करके जनकजी कहते हैं कि जितना दृश्य जगत् है, वह मेरे में ही अध्यस्त अर्थात् कल्पित है, क्योंकि परमार्थ दृष्टि से कोई भी देहादिक मेरे में नहीं है । जैसे आकाश में नीलता; मरुस्थल में जल; बन्ध्या का पुत्र; शश के शृङ्ग; ये सब तीनों कालों में नहीं हैं, वैसे ही जगत् भी वास्तव में तीनों कालों में नहीं है, और न कोई मेरे देहादिक है । मैं माया और उसके कार्य से परे एवं ज्ञान-स्वरूप हूँ ॥ २ ॥
मूलम् ।
सशरीरमहो विश्वं परित्यज्य मयाऽऽधुना । कुतश्चित्कौशलादेव परमात्मा विलोक्यते ॥ ३ ॥
पदच्छेदः ।
सशरीरम्, अहो, विश्वम्, परित्यज्य, मया, अधुना, कुतश्चित्, कौशलात्, एव, परमात्मा, विलोक्यते ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| अहो= | आश्चर्य है कि | ||
| सशरीरम्= | शरीर सहित | परित्यज्य= | त्याग करके अर्थात् अपने से पृथक् समझ कर |
| विश्वम्= | विश्व को |
४६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
कुतश्चित् = कहीं मया = मुझ करके कौशलात् = } कुशलता से अर्थात् उपदेश से अधुना = अब परमात्मा = ईश्वर एव = ही विलोक्यते = देखा जाता है
भावार्थ । जनकजी फिर भी कहते हैं कि जो लिंग शरीर और कारण-शरीर के सहित संपूर्ण विश्व-विचार करके, शास्त्र और आचार्य के उपदेश करके और चातुर्य करके आत्मा से पृथक्, अपनी सत्ता से शून्य आत्मा की सत्ता करके सत्यवत् भान होता था, उसको मैं अब मिथ्या जानकर अपने ज्ञान-स्वरूप आत्मा का अवलोकन कर रहा हूँ । क्योंकि आत्म-ज्ञान के अतिरिक्त और कोई भी आत्मा के अवलोकन का उपाय नहीं है ॥ ३ ॥
मूलम् । यथा न तोयतो भिन्नास्तरङ्गाः फेनबुद्बुदाः । आत्मनो न तथा भिन्नं विश्वमात्मविनिर्गतम् ॥४॥
पदच्छेदः । तथा, न, तोयतः, भिन्नाः, फेनबुद्बुदाः, आत्मनः, न, तथा, भिन्नम्, विश्वम् आत्मविनिर्गतम् ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| तथा | = जैसे | फेनबुद्बुदा | = फेन और बुल्ला |
| तोयतः | = जल से | भिन्नाः | = भिन्न |
| तरङ्गाः | = तरङ्ग | न | = नहीं |
दूसरा प्रकरण ४७
तथा=वैसा ही | विश्वम्=विश्व आत्मवि-निर्गतम् = आत्म-विष्ट | आत्मनः=आत्मा से भिन्नम् न=भिन्न नहीं है ॥
भावार्थ । दृष्टांत—जैसे तरंग और फेन जल से भिन्न नहीं हैं, क्योंकि जल ही उन सबका उपादान कारण है, वैसे ही यह विश्व आत्मा से उत्पन्न है अर्थात् इसका उपादान कारण आत्मा ही है। इस कारण ऐसा जो जगत् है, वह भी आत्मा से भिन्न नहीं है। जैसे तरंग बुद्बुदादि में जल अनुगत है—वैसे स्वच्छ चैतन्य भी सम्पूर्ण विश्व में अनुगत है। जैसे कल्पित सर्प अपने अधिष्ठानभूत रज्जु से भिन्न नहीं है, किन्तु रज्जु-रूप ही है—वैसे कल्पित जगत् भी अधिष्ठानभूत चेतन से भिन्न नहीं है ॥ ४ ॥
मूलम् ।
तन्तुमात्रो भवेदेव पटो यद्वद्विचारतः ।
आत्मतन्मात्रमेवेदं तद्वद्विश्वं विचारितम् ॥ ५ ॥
पदच्छेदः । तन्तुमात्रः, भवेत्, एव, पटः, यद्वत्, विचारतः, आत्मतन्मात्रम्, एव, इदम्, तद्वत्, विश्वम्, विचारितम् ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| यद्वत् | =जैसे | विचारतः | =विचार से |
| पटः | =कपड़ा | इदम् | =यह |
| तन्तुमात्रः | =तंतुमात्र | विश्वम् | =संसार |
| एव | =ही | आत्मतन्मात्रम् | =आत्मसत्तामात्र |
| भवेत् | =होता है | एव | =ही |
| तद्वत् | =वैसे ही | विचारितम् | =प्रतीत होता है ॥ |
४८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
भावार्थ ।
जैसे स्थूल दृष्टि करके तन्तुओं से विलक्षण पट प्रतीत होता है, परन्तु विचार-पूर्वक देखने से तन्तु-रूप ही पट है, तन्तुओं से भिन्न पट कोई वस्तु नहीं है—वैसे ही स्थूल दृष्टि द्वारा देखने पर ब्रह्म से विलक्षण जगत् प्रतीत होता है, परन्तु युक्ति और विचार से आत्म-रूप ही जगत् है। जैसे तन्तु अपनी सत्ता करके पट में अनुगत है, वैसे ही आत्मा भी अपनी सत्ता करके अधिष्ठान भूतरूप होकर सारे जगत् में अनुगत है ॥ ५ ॥
मूलम् ।
यथैवेक्षुरसे कॢप्ता तेन व्याप्तैव शर्करा ।
तथा विश्वं मयि कॢप्तं मया व्याप्तं निरन्तरम् ॥ ६ ॥
पदच्छेदः ।
यथा, एव, इक्षुरसे, कॢप्ता, तेन, व्याप्ता, एव, शर्करा, तथा, विश्वम्, मयि, कॢप्तं, मया, व्याप्तम्, निरन्तरम् ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| यथा | जैसे | तथा एव | वैसे ही |
| एव | निश्चय करके | मयि | मुझमें |
| इक्षुरसे | इक्षु के रस में | कॢप्तम् | अध्यस्त हुआ |
| कॢप्ता | अध्यस्त हुई | विश्वम् | संसार |
| शर्करा | शक्कर | मया | मुझ करके |
| तेन | उसी करके | निरन्तरम् | सदा |
| व्याप्ता एव | व्याप्त है | व्याप्तम् | व्याप्त है ॥ |
दूसरा प्रकरण । ४९
भावार्थ ।
आत्मा करके सारा जगत् व्याप्त है, इसी में जनकजी दृष्टान्त कहते हैं—
जैसे इक्षु जो गन्ना है, सो रस में अध्यस्त है, और उसी मधुर-रस करके गन्ना भी व्याप्त है, वैसे ही मेरे नित्य आनन्द-स्वरूप में यह सारा जगत् अध्यस्त है, औ मेरे नित्य आनन्द-रूप करके बाहर और भीतर से व्याप्त भी है, इस वास्ते यह विश्व भी आत्म-स्वरूप ही है ॥ ६ ॥
मूलम् ।
आत्माऽज्ञानाज्जगद्भाति आत्मज्ञानान्नभासते ।
रज्ज्वज्ञानादहिर्भाति तज्ज्ञानाद्भासते न हि ॥ ७ ॥
पदच्छेदः ।
आत्माऽज्ञानात्, जगत्, भाति, आत्मज्ञानात्, न, भासते, रज्ज्वज्ञानात्, अहिः, भाति, तज्ज्ञानात्, भासते, न, हि ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| आत्माऽज्ञानात् | =आत्मा के अज्ञान से | अहिः | =सर्प |
| जगत् | =संसार | भाति | =भासता है |
| भाति | =भासता है | च | =और |
| आत्मज्ञानात् | =आत्मा के ज्ञान से | तज्ज्ञानात् | =उसके ज्ञान से |
| न भासते | =नहीं भासता है | नहि | =नहीं |
| यथा | =जैसे | भासते | =भासता है ॥ |
| रज्ज्वज्ञानात् | =रज्जु के अज्ञान से |
५० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
भावार्थ ।
आत्मा के स्वरूप के अज्ञान करके जगत् सत्य प्रतीत होता है और अधिष्ठान-स्वरूप आत्मा के ज्ञान करके असत् होता है । इसमें लोक-प्रसिद्ध दृष्टान्त कहते हैं—
रज्जु के स्वरूप के अज्ञान से जैसे सर्प प्रतीत होता है, और रज्जु के स्वरूप के ज्ञान से उसमें सर्प प्रतीत नहीं होता है; वैसे ही आत्मा के स्वरूप के अज्ञान करके जगत् प्रतीत होता है, और आत्मा के स्वरूप के ज्ञान करके जगत् प्रतीत नहीं होता है ॥ ७ ॥
मूलम् । प्रकाशो मे निजं रूपं नातिरिक्तोऽस्म्यहं ततः । यदा प्रकाशते विश्वं तदाऽहं भास एव हि ॥ ८ ॥
पदच्छेदः । प्रकाशः, मे, निजम्, न, अतिरिक्तः, अस्मि, अहम्, ततः, यदा, प्रकाशते, विश्वम्, तदा, अहम्भासः, एव, हि ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| प्रकाशः=प्रकाश | यदा=जब |
| मे=मेरा | विश्वम्=संसार |
| निजम्=निज | प्रकाशते=प्रकाशता है |
| रूपम्=रूप है | तदा=तब |
| अहम्=मैं | तत्=वह |
| ततः=उससे | अहंभासः=मेरे प्रकाश से |
| अतिरिक्तः=अलग | एव हि=ही |
| न अस्मि=नहीं हूँ | +प्रकाशते=प्रकाशता है ॥ |
दूसरा प्रकरण । ५१
भावार्थ ।
**प्रश्न—**आत्मा के स्वरूप का जबतक अज्ञान बना है, तबतक आत्मा के प्रकाश का भी प्रभाव ही रहता है, तब फिर आत्मा के स्वरूप के प्रकाश का अभाव होने से जगत् का भान कैसे हो सकता है ?
**उत्तर—**जनकजी कहते हैं कि मेरा जो प्रकाश अर्थात् नित्य-ज्ञान है, वह मेरा स्वाभाविक स्वरूप है, मैं उस प्रकाश से भिन्न नहीं हूँ, इसी वास्ते जिस काल में मुझको विश्व प्रतीत होता है, तब आत्मा के प्रकाश से ही प्रतीत होता है ।
**प्रश्न—**यदि स्वरूप भूतचेतन ही प्रकाशक है, तब फिर अज्ञान कैसे रह सकता है ? क्योंकि ज्ञान और अज्ञान दोनों तम और प्रकाश की तरह परस्पर विरोधी हैं ।
**उत्तर—**दो प्रकार का चेतन है । एक सामान्य चेतन, दूसरा विशेष चेतन । विशेष चेतन अज्ञान का विरोधी है अर्थात् बाधक है । सामान्य चेतन अज्ञान का विरोधी नहीं है, किन्तु साधक है अर्थात् अज्ञान को सिद्ध करता है । जैसे अग्नि दो प्रकार की है । एक सामान्य अग्नि, दूसरी विशेष अग्नि है । सामान्य अग्नि तो सब काष्ठों में व्यापक है, परन्तु काष्ठों के स्वरूप को जलाती नहीं है, किन्तु बनाती है, क्योंकि जितने जगत् के पदार्थ हैं, वे सब भूतों के पञ्चीकरण से बने हैं । जैसे जो लकड़ी पंचतत्त्वों से बनी है, उसको सामान्य तेज अर्थात् अग्नि जो उसके भीतर है, जलाती नहीं है, पर जब दो लकड़ियों के परस्पर रगड़ से जो विशेष अग्नि-रूप तेज उसमें से उत्पन्न होता है, वह तुरंत उस लकड़ी को जला देता है, क्योंकि वह उसका विरोधी
५२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
है, वैसे सामान्य चेतन जो सर्वत्र व्यापक है, वह उस अज्ञान का विरोधी अर्थात् बाधक नहीं है, किन्तु अपनी सत्ता करके उसका साधक है, और आत्माकारवृत्त्यवच्छिन्न विशेष चेतन है, वही उस अज्ञान का बाधक अर्थात् नाशक है । यदि स्वरूप चेतन अज्ञान का विरोधी होवे, तब जड़ की सिद्धि भी न होवेगी । यदि आत्मा के प्रकाश का भी अभाव माना जावे, तब जगदान्ध्य प्रसंग हो जावेगा । इस वास्ते आत्मा के स्वरूप प्रकाश करके ही जगत् भी प्रकाशमान हो रहा है, स्वतः जगत् मिथ्या है ॥ ८ ॥
मूलम् । अहो विकल्पितं विश्वमज्ञानान्मयि भासते । रूप्यं शुक्तौ फणी रज्जौ वारि सूर्यकरे यथा ॥ ९ ॥
पदच्छेदः । अहो, विकल्पितम्, अज्ञानात्, विश्वम्, मयि, भासते, रूप्यम्, शुक्तौ, फणी, रज्जौ, वारि, सूर्यकरे, यथा ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| अहो=आश्चर्य है कि | शुक्तौ=शुक्ति में |
| विकल्पितम्=कल्पित | रूप्यम्=चाँदी |
| विश्वम्=संसार | रज्जौ=रस्सी में |
| अज्ञानात्=अज्ञान से | फणी=सर्प |
| मयि=मेरे में | सूर्यकरे=सूर्य की किरणों में |
| ईदृशम्=ऐसा | वारि=जल |
| भासते=भासता है | भासते=भासता है ॥ |
| यथा=जैसे |
भावार्थ । जनकजी कहते हैं कि जैसे शुक्ति के अज्ञान जैसे शुक्ति
दूसरा प्रकरण । ५३
में रजत असत् प्रतीत होता है—वैसे ही अज्ञान करके मेरे स्वप्रकाश आत्मा में असत् जगत् प्रतीत हो रहा है, यही बड़ा भारी आश्चर्य है ॥ ९ ॥
मूलम् ।
मत्तो विनिर्गतं विश्वं मय्येव लयमेष्यति । मृदि कुम्भोज़ले वीचिः कनके कटकं यथा ॥ १० ॥
पदच्छेदः ।
मत्तः, विनिर्गतम्, विश्वम्, मयि, एव, लयम्, एष्यति, मृदि, कुम्भः, जले, वीचिः, कनके, कटकम्, यथा ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| मत्तः | =मुझ से | मृदि | =मिट्टी में |
| विनिर्गतम् | =उत्पन्न हुआ | कुम्भ | =घड़ा |
| इदम् | =यह | जले | =जल में |
| विश्वम् | =संसार | वाचिः | =लहर |
| मयि | =मुझमें | कनके | =स्वर्ण में |
| लयम् | =लय को | कटकम् | =भूषण |
| एष्यति | =प्राप्त होगा | $\left. लय यान्ति \right}$ | =लय होते हैं ॥ |
| यथा | =जैसे |
भावार्थ ।
जैसे घट मृत्तिका का कार्य है अर्थात् मृत्तिका से ही उत्पन्न होता है, और फिर फूटकर मृत्तिका में ही लय हो जाता है—वैसे ही जगत् भी प्रकृति का कार्य है अर्थात् प्रकृति से ही उत्पन्न होता है और प्रकृति में ही लय हो जाता है । चेतन आत्मा से न जगत् उत्पन्न होता है, और न उसमें लय होता है, क्योंकि जगत् जड़ और आत्मा चेतन
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है । चेतन से जड़ की उत्पत्ति बनती नहीं है—ऐसी सांख्य-शास्त्रवाले की शङ्का है—उसके उत्तर को कहते हैं— सांख्य-शास्त्रवाले परिणामवादी हैं और पूर्ववाली अवस्था से अवस्थान्तरता को प्राप्त होने का नाम ही परिणाम है । जैसे दूध का परिणाम दधि; मृत्तिका का घट और सुवर्ण का कुण्डल है—वैसे प्रकृति का परिणाम जगत् है—ऐसे सांख्य-शास्त्रवाले मानते हैं । नैयायिक आरम्भवादी हैं । अन्य वस्तु से अन्य वस्तु की उत्पत्ति का नाम आरम्भवाद है । जैसे अन्य तन्तु से अन्य पट की उत्पत्ति होती है । वैसे अन्य परमाणुओं से अन्य रूप जगत् की भी उत्पत्ति होती है । वेदान्ती का तो विवर्त्तवाद है । जो एक ही वस्तु अपनी पूर्ववाली अवस्था से अन्य अवस्था करके प्रतीत होवे, उसी का नाम विवर्त्त है । जैसे रज्जु का विवर्त्त सर्प है, वह रज्जु ही सर्प-रूप करके प्रतीत होती है । यदि जगत् ब्रह्म का परिणाम माना जावे, तब तो दोष आवे कि चेतन से जड़ कैसे उत्पन्न होता है ? और कैसे जगत् चेतन में लय हो जाता है ? ये सब दोष वेदान्ती के मत में नहीं आते हैं । क्योंकि जैसे रज्जु के अज्ञान से रज्जु सर्प-रूप प्रतीत होती है, और रज्जु के ज्ञान करने उस सर्प की निवृत्ति हो जाती है—वैसे ब्रह्म, आत्मा के स्वरूप के ज्ञान करके जगत् की निवृत्ति हो जाती है । सांख्यवाले और नैयायिक के मत में अनेक दोष पड़ते हैं । एक तो वेद में परिणामवाद और आरम्भवाद कहीं भी नहीं लिखा है, अतएव उनका मत वेद-विरुद्ध है । दूसरे