अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
पृष्ठ 56, कुल 405 में से
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दूसरा प्रकरण । ४९
भावार्थ ।
आत्मा करके सारा जगत् व्याप्त है, इसी में जनकजी दृष्टान्त कहते हैं—
जैसे इक्षु जो गन्ना है, सो रस में अध्यस्त है, और उसी मधुर-रस करके गन्ना भी व्याप्त है, वैसे ही मेरे नित्य आनन्द-स्वरूप में यह सारा जगत् अध्यस्त है, औ मेरे नित्य आनन्द-रूप करके बाहर और भीतर से व्याप्त भी है, इस वास्ते यह विश्व भी आत्म-स्वरूप ही है ॥ ६ ॥
मूलम् ।
आत्माऽज्ञानाज्जगद्भाति आत्मज्ञानान्नभासते ।
रज्ज्वज्ञानादहिर्भाति तज्ज्ञानाद्भासते न हि ॥ ७ ॥
पदच्छेदः ।
आत्माऽज्ञानात्, जगत्, भाति, आत्मज्ञानात्, न, भासते, रज्ज्वज्ञानात्, अहिः, भाति, तज्ज्ञानात्, भासते, न, हि ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| आत्माऽज्ञानात् | =आत्मा के अज्ञान से | अहिः | =सर्प |
| जगत् | =संसार | भाति | =भासता है |
| भाति | =भासता है | च | =और |
| आत्मज्ञानात् | =आत्मा के ज्ञान से | तज्ज्ञानात् | =उसके ज्ञान से |
| न भासते | =नहीं भासता है | नहि | =नहीं |
| यथा | =जैसे | भासते | =भासता है ॥ |
| रज्ज्वज्ञानात् | =रज्जु के अज्ञान से |