अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
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५० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
भावार्थ ।
आत्मा के स्वरूप के अज्ञान करके जगत् सत्य प्रतीत होता है और अधिष्ठान-स्वरूप आत्मा के ज्ञान करके असत् होता है । इसमें लोक-प्रसिद्ध दृष्टान्त कहते हैं—
रज्जु के स्वरूप के अज्ञान से जैसे सर्प प्रतीत होता है, और रज्जु के स्वरूप के ज्ञान से उसमें सर्प प्रतीत नहीं होता है; वैसे ही आत्मा के स्वरूप के अज्ञान करके जगत् प्रतीत होता है, और आत्मा के स्वरूप के ज्ञान करके जगत् प्रतीत नहीं होता है ॥ ७ ॥
मूलम् । प्रकाशो मे निजं रूपं नातिरिक्तोऽस्म्यहं ततः । यदा प्रकाशते विश्वं तदाऽहं भास एव हि ॥ ८ ॥
पदच्छेदः । प्रकाशः, मे, निजम्, न, अतिरिक्तः, अस्मि, अहम्, ततः, यदा, प्रकाशते, विश्वम्, तदा, अहम्भासः, एव, हि ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| प्रकाशः=प्रकाश | यदा=जब |
| मे=मेरा | विश्वम्=संसार |
| निजम्=निज | प्रकाशते=प्रकाशता है |
| रूपम्=रूप है | तदा=तब |
| अहम्=मैं | तत्=वह |
| ततः=उससे | अहंभासः=मेरे प्रकाश से |
| अतिरिक्तः=अलग | एव हि=ही |
| न अस्मि=नहीं हूँ | +प्रकाशते=प्रकाशता है ॥ |