भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

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४८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

भावार्थ ।

जैसे स्थूल दृष्टि करके तन्तुओं से विलक्षण पट प्रतीत होता है, परन्तु विचार-पूर्वक देखने से तन्तु-रूप ही पट है, तन्तुओं से भिन्न पट कोई वस्तु नहीं है—वैसे ही स्थूल दृष्टि द्वारा देखने पर ब्रह्म से विलक्षण जगत् प्रतीत होता है, परन्तु युक्ति और विचार से आत्म-रूप ही जगत् है। जैसे तन्तु अपनी सत्ता करके पट में अनुगत है, वैसे ही आत्मा भी अपनी सत्ता करके अधिष्ठान भूतरूप होकर सारे जगत् में अनुगत है ॥ ५ ॥

मूलम् ।

यथैवेक्षुरसे कॢप्ता तेन व्याप्तैव शर्करा ।
तथा विश्वं मयि कॢप्तं मया व्याप्तं निरन्तरम् ॥ ६ ॥

पदच्छेदः ।

यथा, एव, इक्षुरसे, कॢप्ता, तेन, व्याप्ता, एव, शर्करा, तथा, विश्वम्, मयि, कॢप्तं, मया, व्याप्तम्, निरन्तरम् ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
यथाजैसेतथा एववैसे ही
एवनिश्चय करकेमयिमुझमें
इक्षुरसेइक्षु के रस मेंकॢप्तम्अध्यस्त हुआ
कॢप्ताअध्यस्त हुईविश्वम्संसार
शर्कराशक्करमयामुझ करके
तेनउसी करकेनिरन्तरम्सदा
व्याप्ता एवव्याप्त हैव्याप्तम्व्याप्त है ॥