भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

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दूसरा प्रकरण ४७

तथा=वैसा ही | विश्वम्=विश्व आत्मवि-निर्गतम् = आत्म-विष्ट | आत्मनः=आत्मा से भिन्नम् न=भिन्न नहीं है ॥

भावार्थ । दृष्टांत—जैसे तरंग और फेन जल से भिन्न नहीं हैं, क्योंकि जल ही उन सबका उपादान कारण है, वैसे ही यह विश्व आत्मा से उत्पन्न है अर्थात् इसका उपादान कारण आत्मा ही है। इस कारण ऐसा जो जगत् है, वह भी आत्मा से भिन्न नहीं है। जैसे तरंग बुद्बुदादि में जल अनुगत है—वैसे स्वच्छ चैतन्य भी सम्पूर्ण विश्व में अनुगत है। जैसे कल्पित सर्प अपने अधिष्ठानभूत रज्जु से भिन्न नहीं है, किन्तु रज्जु-रूप ही है—वैसे कल्पित जगत् भी अधिष्ठानभूत चेतन से भिन्न नहीं है ॥ ४ ॥

मूलम् । तन्तुमात्रो भवेदेव पटो यद्वद्विचारतः ।
आत्मतन्मात्रमेवेदं तद्वद्विश्वं विचारितम् ॥ ५ ॥

पदच्छेदः । तन्तुमात्रः, भवेत्, एव, पटः, यद्वत्, विचारतः, आत्मतन्मात्रम्, एव, इदम्, तद्वत्, विश्वम्, विचारितम् ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
यद्वत्=जैसेविचारतः=विचार से
पटः=कपड़ाइदम्=यह
तन्तुमात्रः=तंतुमात्रविश्वम्=संसार
एव=हीआत्मतन्मात्रम्=आत्मसत्तामात्र
भवेत्=होता हैएव=ही
तद्वत्=वैसे हीविचारितम्=प्रतीत होता है ॥