अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 53, कुल 405 में से
संदर्भ में पढ़ें४६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
कुतश्चित् = कहीं मया = मुझ करके कौशलात् = } कुशलता से अर्थात् उपदेश से अधुना = अब परमात्मा = ईश्वर एव = ही विलोक्यते = देखा जाता है
भावार्थ । जनकजी फिर भी कहते हैं कि जो लिंग शरीर और कारण-शरीर के सहित संपूर्ण विश्व-विचार करके, शास्त्र और आचार्य के उपदेश करके और चातुर्य करके आत्मा से पृथक्, अपनी सत्ता से शून्य आत्मा की सत्ता करके सत्यवत् भान होता था, उसको मैं अब मिथ्या जानकर अपने ज्ञान-स्वरूप आत्मा का अवलोकन कर रहा हूँ । क्योंकि आत्म-ज्ञान के अतिरिक्त और कोई भी आत्मा के अवलोकन का उपाय नहीं है ॥ ३ ॥
मूलम् । यथा न तोयतो भिन्नास्तरङ्गाः फेनबुद्बुदाः । आत्मनो न तथा भिन्नं विश्वमात्मविनिर्गतम् ॥४॥
पदच्छेदः । तथा, न, तोयतः, भिन्नाः, फेनबुद्बुदाः, आत्मनः, न, तथा, भिन्नम्, विश्वम् आत्मविनिर्गतम् ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| तथा | = जैसे | फेनबुद्बुदा | = फेन और बुल्ला |
| तोयतः | = जल से | भिन्नाः | = भिन्न |
| तरङ्गाः | = तरङ्ग | न | = नहीं |