भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

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दूसरा प्रकरण । ५९

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
अहम्= मैंयेन= क्यों कि
अहो= आश्चर्य-रूप हूँशरीरेण= शरीर से
नमः= नमस्कार हैअसंस्पृश्य= पृथक्
मह्यम्= मुझकोमया= मुझ करके
इह= इस संसार में+ इदम्= यह
मत्समः= मेरे तुल्यचिरम्= चिरकाल पर्यन्त
दक्षः= चतुरविश्वम्= विश्व
न अस्ति= कोई नहीं हैधृतम्= धारण किया गया है ॥

भावार्थ ।

**प्रश्न—**असंग आत्मा का शरीरादिकों के साथ संसर्ग कैसे हो सकता है ? और जगत् को कैसे धारण कर सकता है ?

**उत्तर—**जनकजी कहते हैं कि यही तो बड़ा आश्चर्य है कि जो मैं असंग हो करके भी शरीरादिकों को चेष्टा कराता हूँ । जैसे चुम्बक पत्थर आप क्रिया से रहित भी है तथापि लोहे को चेष्टा कराता है । जैसे उसमें एक विलक्षण शक्ति है, वैसे आत्मा में भी एक विलक्षण शक्ति है । वह शरीरादिकों के अन्तर असंग स्थित है, पर क्रिया-रहित है, परन्तु शरीर इन्द्रियादिक सब अपने-अपने काम को करते हैं । जैसे अग्नि घृत के पिण्ड से अलग रह करके भी उसको पिघला देती है, वैसे ही आत्मा भी सबसे असंग रह करके भी और क्रिया से रहित हो करके भी सारे जगत् को क्रियावान् कर देता है । इसी से जनकजी कहते हैं कि मेरे तुल्य कोई चतुर नहीं है, इसी कारण मैं अपने आपको ही नमस्कार करता