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अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

दूसरा प्रकरण । ५९

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
अहम्= मैंयेन= क्यों कि
अहो= आश्चर्य-रूप हूँशरीरेण= शरीर से
नमः= नमस्कार हैअसंस्पृश्य= पृथक्
मह्यम्= मुझकोमया= मुझ करके
इह= इस संसार में+ इदम्= यह
मत्समः= मेरे तुल्यचिरम्= चिरकाल पर्यन्त
दक्षः= चतुरविश्वम्= विश्व
न अस्ति= कोई नहीं हैधृतम्= धारण किया गया है ॥

भावार्थ ।

**प्रश्न—**असंग आत्मा का शरीरादिकों के साथ संसर्ग कैसे हो सकता है ? और जगत् को कैसे धारण कर सकता है ?

**उत्तर—**जनकजी कहते हैं कि यही तो बड़ा आश्चर्य है कि जो मैं असंग हो करके भी शरीरादिकों को चेष्टा कराता हूँ । जैसे चुम्बक पत्थर आप क्रिया से रहित भी है तथापि लोहे को चेष्टा कराता है । जैसे उसमें एक विलक्षण शक्ति है, वैसे आत्मा में भी एक विलक्षण शक्ति है । वह शरीरादिकों के अन्तर असंग स्थित है, पर क्रिया-रहित है, परन्तु शरीर इन्द्रियादिक सब अपने-अपने काम को करते हैं । जैसे अग्नि घृत के पिण्ड से अलग रह करके भी उसको पिघला देती है, वैसे ही आत्मा भी सबसे असंग रह करके भी और क्रिया से रहित हो करके भी सारे जगत् को क्रियावान् कर देता है । इसी से जनकजी कहते हैं कि मेरे तुल्य कोई चतुर नहीं है, इसी कारण मैं अपने आपको ही नमस्कार करता

६० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

हूँ । एवं मुझसे अन्य दूसरा कोई नहीं है कि उसको नमस्कार
करूँ ॥ १३ ॥

मूलम् ।
अहो अहं नमो मह्यं यस्य मे नास्ति किञ्चन ।
अथवा यस्य मे सर्वं यद्वाङ्मनसगोचरम् ॥ १४ ॥

पदच्छेदः ।
अहो, अहम्, नमः, मह्यम्, यस्य, मे, न, अस्ति, किञ्चन,
अथवा, यस्य, मे, सर्वम्, यत्, वाङ्मनसगोचरम् ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
अहम्= मैंअस्ति= है
अहो= आश्चर्य-रूप हूँअथवा= या
मह्यम्= मुझकोयस्य= जिस
नमः= नमस्कार हैमे= मेरे का
यस्य= जिस+ तत्= वह
मे= मेरे कासर्वम्= सब है
किञ्चन= कुछयत्= जो कुछ
= नहींवाङ्मनसगोचरम्= वाणी और मन का विषय है ॥

भावार्थ ।
जनकजी कहते हैं कि मेरे में सम्बन्धवाला कोई पदार्थ नहीं है, क्योंकि वास्तव में कोई पदार्थ सत्य नहीं है, केवल एक ब्रह्मात्मा ही परमार्थ से सत्य है ।
नेह नाना नास्ति किञ्चन ।
इस चेतन आत्मा में नानारूप करके जो जगत् प्रतीत होता है, सो वास्तव में नहीं है—ऐसे श्रुति कहती है ।

दूसरा प्रकरण । ६१

मृत्योर्वै मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति ।

वह मृत्यु से भी मृत्यु को प्राप्त होता है, जो ब्रह्म में नानात्व को देखता है अर्थात् नाना आत्मा को देखता है इत्यादि अनेक श्रुतिवाक्य है जो द्वैत का निषेध करते हैं । फिर जनकजी कहते हैं कि जितना मन और वाणी का विषय है, वह सब मिथ्या है, उसका मुझ चैतन्य-स्वरूप आत्मा के साथ कोई भी सम्बन्ध नहीं है । इसी वास्ते मैं अपने ही आश्चर्य-रूप आत्मा को नमस्कार करता हूँ ॥१४॥

मूलम् ।

ज्ञानं ज्ञेयं तथा ज्ञाता त्रितयं नास्ति वास्तवम् ।
अज्ञानाद्भाति यत्रेदं सोऽहमस्मि निरञ्जनः ॥ १५ ॥

पदच्छेदः ।

ज्ञानम्, ज्ञेयम्, तथा, ज्ञाता, त्रितयम्, न, अस्ति, वास्तवम्, अज्ञानात्, भाति, यत्र, इदम्, सः, अहम्, अस्मि, निरञ्जनः ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
ज्ञानम् =ज्ञानअज्ञानात् =अज्ञान से
ज्ञेयम् =ज्ञेय+ यत्र =जिस विषे
तथा =और
ज्ञाता =ज्ञाताइदम् =यह तीनों
त्रितयम् =तीनोंभाति =भासता है
यत्र =जिसेसः =सोई
वास्तवम् =यथार्थ सेअहम् =मैं
न अस्ति =नहीं हैनिरञ्जनः =निरञ्जन-रूप
+ च =औरअस्मि =हूँ ॥

६२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

भावार्थ ।

जनकजी कहते हैं कि ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय; यह जो त्रिपुटी-रूप है, सो भी वास्तव में नहीं है, किन्तु अज्ञान करके चेतन में ये तीनों प्रतीत होते हैं। वास्तव में चेतन का इनके साथ भी कोई सम्बन्ध नहीं है। जो माया और माया के कार्य से रहित चेतन आत्मा है, सो मैं ही हूँ ॥१५॥

मूलम् ।

द्वैतमूलमहो दुःखं नान्यत्तस्यास्ति भेषजम् ।
दृश्यमेतन्मृषा सर्वमेकोऽहं चिद्रसोऽमलः ॥ १६ ॥

पदच्छेदः ।

द्वैतमूलम्, अहो, दुःखम्, न, अन्यत्, तस्य, अस्ति, भेषजम्, दृश्यम्, एतत्, मृषः, सर्वम्, एकः, अहम्, चिद्रसः, अमलः ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
अहो =आश्चर्य्य है किएतत् =यह
द्वैतमूलम् =द्वैत है मूलकारण जिसका, ऐसासर्वम् =सब
यत् =जोदृश्यम् =दृश्य
दुःखम् =दुःख हैमृषा =झूठ है
तस्य =उसकीअहम् =मैं
भेषजम् =ओषधिएकः =एक अद्वैत
अन्यतः =कोईअमलः =शुद्ध
अस्ति =नहीं हैचिद्रसः =चैतन्य-रस हूँ

भावार्थ ।

प्रश्न—जब आत्मा निरञ्जन है, तब उसका दुःख के

दूसरा प्रकरण । ६३

साथ सम्बन्ध कैसे हो सकता है, पर देखने में आता है और लोक भी कहते हैं कि हम बड़े दुःखी हैं ?

उत्तर—निरञ्जन आत्मा को भी द्वैत भ्रम से दुःख प्रतीत होता है, वास्तव में वह दुःखी नहीं ।

प्रश्न—इस भ्रम-रूपी महान् व्याधि की ओषधि क्या है ?

उत्तर—जो द्वैत प्रतीत हो रहा है, यह सब मिथ्या है । वास्तव में सत्य नहीं है । वास्तव में सत्यबोध-रूप आत्मा ही है, ऐसा जो ज्ञान है, वही त्रिविध दुःख की निवृत्ति की ओषधि है, और कोई उसकी ओषधि नहीं है ॥ १६ ॥

मूलम् ।

बोधमात्रोऽहमज्ञानादुपाधिः कल्पितो मया । एवं विमृश्यतो नित्यं निर्विकल्पे स्थितिर्मम ॥ १७ ॥

पदच्छेदः ।

बोधमात्रः, अहम्, अज्ञानात्, उपाधिः, कल्पितः, मया, एवम्, विमृश्यतः, नित्यम्, निर्विकल्पे, स्थितिः, मम ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
अहम्=मैंएवम्=इस प्रकार
बोधमात्रः=बोध-रूप हूँनित्यम्=नित्य
मया=मुझ करकेविमृश्यतः=विचार करते हुए
अज्ञानात्=अज्ञान सेमम=मेरा
उपाधिः=उपाधिस्थितिः=स्थिति
कल्पितः=कल्पना किया गया हैनिर्विकल्पे=निर्विकल्प में है ॥

६४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

भावार्थ ।

**प्रश्न—**यह जो द्वैत-प्रपंच का अध्यास है, इसका उपादान कारण कौन है ?

**उत्तर—**जनकजी कहते हैं कि नित्य ज्ञान-स्वरूप जो मैं हूँ, सो मैं ही अज्ञान द्वारा सारे प्रपंच का उपादान कारण हूँ अथवा अज्ञान के सहित जो कल्पित सारा प्रपंच है, उसका अधिष्ठान-रूप होने से मैं ही उपादान कारण हूँ । विचार के विना जो सब मिथ्या प्रपंच सत्य की तरह प्रतीत होता था, सो नित्य विचार करने से असत्य भान होने लगा । अब अपने स्वरूप चैतन्य में प्राप्त होकर जीवन्मुक्ति को प्राप्त हुआ हूँ ॥ १७ ॥

मूलम् ।

अहो मयि स्थितं विश्वं वस्तुतो न मयि स्थितम् ।
न मे बन्धोऽस्तिमोक्षो वा भ्रान्तिः शान्तानिराश्रया ॥ १८ ॥

पदच्छेदः ।

अहो, मयि, स्थितम्, विश्वम्, वस्तुतः, न, मयि, स्थितम्,
न, मे, बन्धः, अस्ति, मोक्षः, वा, भ्रान्तिः, शान्ता, निराश्रया ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
मे=मेरान=नहीं
बन्धः=बन्धअस्ति=है
वा=याअहो=आश्चर्य है कि
मोक्षः=मोक्षमयि=मेरे में स्थित हुआ

दूसरा प्रकरण । ६५

विश्वम्=जगत्
वस्तुतः=वास्तव में
मयि=मेरे विषे
न=नहीं
स्थितम्=स्थित है

| + इतिविचारतः=ऐसे विचार से
निराश्रया=आश्रयरहित
भ्रान्ति=भ्रान्ति
शान्ता=शान्त हुई है ॥

भावार्थ ।

**प्रश्न—**मुक्ति क्या पदार्थ है ?
**उत्तर—**आनन्दात्मकब्रह्मावाप्तिश्च मोक्षः ।
आनंद-स्वरूप आत्मा की प्राप्ति का नाम ही मुक्ति है ।
**प्रश्न—**यदि पूर्वोक्त मुक्ति को विचार से जन्य मानोगे, तब मुक्ति भी अनित्य हो जावेगी, क्योंकि जो-जो उत्पत्ति-वाला पदार्थ होता है, सो-सो अनित्य होता है—ऐसा नियम है । यदि मुक्ति को विचार से अजन्य मानोगे, तब फिर विचार से रहित पुरुषों की भी मुक्ति होनी चाहिए ?
**उत्तर—**जनकजी कहते हैं कि वास्तव में तो मेरे में न बंध है, न मोक्ष है, क्योंकि मैं नित्य चैतन्य-स्वरूप हूँ ।
**प्रश्न—**जब कि वास्तविक तुम्हारे में बन्ध और मोक्ष कोई नहीं है, तब फिर शास्त्र के विचार का और गुरु के उपदेश का क्या फल हुआ ?
**उत्तर—**जो देहादिकों में चित्रकार की आत्म-भ्रान्ति हो रही है, 'मैं देह हूँ' 'मैं इन्द्रिय हूँ' 'मैं ब्राह्मण हूँ' 'मैं कर्त्ता और भोक्ता-हूँ-' इस भ्रान्ति की जो निवृत्ति है—'न मैं देह हूँ'; और 'न इन्द्रिय हूँ'; 'न मैं ब्राह्मणत्वादि जाति-वाला हूँ'; 'न मैं कर्त्ता और भोक्ता हूँ' किंतु देहादिक से परे इन सबका मैं साक्षी, शुद्ध ज्ञान-स्वरूप हूँ—ऐसा अपने

६६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

स्वरूप का जो यथार्थ बोध है, यही शास्त्र विचार का और गुरु के उपदेश का फल है।
जनकजी कहते हैं कि अहो ! बड़ा आश्चर्य है कि मेरे में स्थित भी संपूर्ण विश्व वास्तव में, तीनों कालों में मेरे में नहीं है—ऐसा विचार करने से मेरी भ्रान्ति दूर हो गई है ॥ १८ ॥

मूलम् ।

सशरीरमिदं विश्वं न किञ्चिदिति निश्चितम् ।
शुद्धचिन्मात्रआत्मा च तत्कस्मिन्कल्पनाऽऽधुना ॥ १९ ॥

पदच्छेदः ।

सशरीरम्, इदम्, विश्वम्, न, किञ्चित्, इति, निश्चितम्, शुद्धचिन्मात्रः, आत्मा, च, तत्, कस्मिन्, कल्पना, अधुना ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
सशरीरम् = शरीर सहितइति = ऐसा
इदम् = यहयदा = जब
विश्वम् = जगत्निश्चितम् = निश्चय हुआ
किञ्चित् न = कुछ नहीं है अर्थात् न सत् है, और न असत् हैतदा = तब
कस्मिन् = किस विषे
= औरअधुना = अब
शुद्धचिन्मात्र = शुद्ध चैतन्य-मात्रकल्पना = विश्व की कल्पना होवे ॥

भावार्थ ।

**प्रश्न—**रज्जु-रूप अधिष्ठान के विद्यमान रहते हुए, कभी न कभी मंद अंधकार में फिर भी सर्प का भ्रम हो

दूसरा प्रकरण । ६७

सकता है, वैसे अधिष्ठान चेतन के होते हुए भो मुक्ति में कभी न कभी प्रपंच भी हो जावेगा ?

उत्तर—शरीर के सहित यह विश्व किंचित् भी सत्य नहीं है, और असत्य है, किन्तु अनिर्वचनीय अज्ञान का कार्य होने से अनिर्वचनीय है । उस अनिर्वचनीय की अज्ञान की निवृत्ति होने से उसके कार्य विश्व की भी निवृत्ति हो जाती है । अज्ञान ही कल्पित विश्व का कारण था, उसके नाश हो जाने से फिर मुक्त पुरुष में विश्व उत्पन्न नहीं होता है । जैसे मंद अंधकार के दूर होने से फिर सर्प की भ्रान्ति भी नहीं होती है, वैसे प्रकाश-स्वरूप आत्मा के ज्ञान से फिर कदापि विश्व की उत्पत्ति नहीं होती है ॥ १९ ॥

मूलम् ।

शरीरं स्वर्गनरकौ बन्धमोक्षौ भयं तथा । कल्पनामात्रमेवैतत्किंमे कार्यं चिदात्मनः ॥ २० ॥

पदच्छेदः ।

शरीरम्, स्वर्गनरकौ, बन्धमोक्षौ, भयम्, तथा कल्पना- मात्रम्, एव, एतत्, किम्, कार्यम्, चिदात्मनः ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
एतत् =यहएव =निःसंदेह
शरीरम् =शरीरकल्पनामात्रम् =कल्पना-मात्र है
स्वर्गनरकौ =स्वर्ग और नरकमे चिदात्मनः =मुझ चैतन्य आत्मा को
बन्धमोक्षौ =बन्ध और मोक्ष
तथा =औरकिम् =क्या
भयम् =भयकार्यम् =कर्त्तव्य है ।

६८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

भावार्थ ।

**प्रश्न—**यदि संपूर्ण प्रपंच अवास्तविक माना जावे, तब वर्ण और जाति आदिकों का आश्रय जो स्थूलशरीर है, वह भी अवास्तविक ही होगा ? और शरीर को आश्रयण करके प्रवृत्त जो विधि-निषेध शास्त्र है, वह भी अवास्तविक ही होगा ? फिर उस शास्त्र द्वारा बोधन किये हुए जो स्वर्ग नरक हैं, वे भी सब अवास्तविक अर्थात् मिथ्या ही होवेंगे ? फिर स्वर्गादिकों में राग, और नरकादिकों से भय भी मिथ्या होंगे । और शास्त्र ने जो बन्ध मोक्ष कहे हैं, वे भी सब मिथ्या ही होंगे ?

**उत्तर—**जनकजी कहते हैं कि शरीरादिक सब कल्पना-मात्र ही हैं । सच्चिदानन्द-स्वरूप मुझ आत्मा का इन शरीरादिकों के साथ कौन सम्बन्ध है, किन्तु कोई भी सम्बन्ध नहीं है । क्योंकि सत्य मिथ्या का वास्तविक सम्बन्ध नहीं बन सकता है और मेरा शरीरादिकों के साथ कोई भी प्रयोजन नहीं है । और जितने विधि-निषेध वाक्य हैं, वे सब अज्ञानी के लिये हैं, ज्ञानवान् का उनमें अधिकार नहीं है, इस वास्ते ज्ञानवान् की दृष्टि में शरीरादिक और विधि-निषेध सब अवास्तविक ही हैं ॥ २० ॥

मूलम् । अहोजनसमूहेऽपि न द्वैतं पश्यतो मम । अरण्यमिव संवृत्तं क्व रतिं करवाण्यहम् ॥ २१ ॥

पदच्छेदः । अहो, जनसमूहे, अपि, न, द्वैतम्, पश्यतः, मम, अरण्यम्, इव, संवृत्तम्, क्व, रतिम्, करवाणि, अहम् ॥

दूसरा प्रकरण । ६९

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
अहो=आश्चर्य है किन संवृत्तम्=नहीं वर्तता है
जनसमूहे=जीवों के बीच मेंतस्मात्=तब
अपि=भीक्व=कैसे
मम=मुझअहम्=मैं
पश्यतः=देखते हुए कारतिम्=मोह को
अरण्यम् इव=अरण्यवत्करवाणि=करूँ ॥
द्वैतम्=द्वैत

भावार्थ

पूर्ववाले वाक्य द्वारा जनकजी ने कहा कि स्वर्गादिकों के साथ मेरा कुछ भी प्रयोजन नहीं है । अब इस वाक्य करके कहते हैं कि इस लोक के साथ भी मेरा कुछ प्रयोजन नहीं है ।

जनकजी कहते हैं कि हे प्रभो ! बड़ा आश्चर्य है कि मैं द्वैत को देखता भी हूँ, तब भी जनों का जो समूह-रूपी द्वैत वन की तरह उत्पन्न हुआ है, उसके बीच में होता हुआ भी उसके साथ मुझको कोई प्रीति नहीं है, क्योंकि मैंने उसको मिथ्या जान लिया है । मिथ्या वस्तु के साथ ज्ञानवान् प्रीति को नहीं करते हैं । अज्ञानी मिथ्या पदार्थों के साथ प्रीति करते हैं । इतना ही ज्ञानी और अज्ञानी का भेद है ॥ २१ ॥

मूलम् ।

नाहं देहो न मे देहो जीवो नाहमहं हि चित् ।
अयमेव हि मे बंध आसीद्या जीविते स्पृहा ॥ २२ ॥

७० अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

पदच्छेदः ।

न, अहम्, देहः, न, मे, देहः, जीवः, न, अहम्, अहम्, हि, चित्, अयम्, एव, हि, मे, बन्धः, आसीत्, या, जीविते, स्पृहा ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
अहम् =मैंहि =निश्चय करके
देहः =शरीरचित् =चैतन्य-रूप हूँ
न =नहीं हूँमे =मेरा
मे =मेराअयम् एव =यही
देहः =शरीरबन्धा =बँधा था
न =नहीं हैया =जो
अहम् =मैंजीविते =जीने में
जीवः =जीवस्पृहा =इच्छा
न =नहीं हूँआसीत् =थी
अहम् =मैं

भावार्थ ।

**प्रश्न—**शरीर में अहंता और ममता अवश्य करनी होगी ? क्योंकि बिना अहंता और ममता के व्यवहार की सिद्धि नहीं होती है ?

**उत्तर—**जनकजी कहते हैं कि मैं देह नहीं हूँ, क्योंकि देह जड़ है, मैं चेतन हूँ, और मेरा देह भी नहीं है, क्योंकि मैं असंग हूँ, मैं जीव अहंकारी भी नहीं हूँ, क्योंकि अहंकार का कर्त्तृत्व धर्म है और नेरा अकर्त्तृत्व धर्म है ।

**प्रश्न—**फिर तुम कौन हो ?

दूसरा प्रकरण । ७१

उत्तर—मैं चैतन्य-स्वरूप अहंकार का भी साक्षी अकर्त्ता, अभोक्ता हूँ।

प्रश्न—जब तुम खान पान आदिक सब व्यवहारों को करते हो, तो तुम अकर्त्ता कैसे हो ?

उत्तर—अज्ञानी पुरुषों की दृष्टि में मैं व्यवहारों का कर्त्ता प्रतीत होता हूँ, परन्तु वास्तव में मैं कर्त्ता नहीं हूँ। क्योंकि कर्तृत्व भोक्तृत्वपना अहंकारी का धर्म है, मुझ आत्मा के ये धर्म नहीं हैं। और ऐसा भी कहा है—

निद्राभिक्षे स्नानशौचे नेच्छामि न करोमि च । द्रष्टारश्चेत्कल्पयन्ति कि मे स्यादन्यकल्पनात् ॥ १ ॥

अर्थात् सोना-जागना, भिक्षा माँगना, स्नान करना, पवित्र रहना, इन सबकी मैं इच्छा नहीं करता हूँ, और न मैं इनको करता हूँ। यदि कोई देखनेवाला मेरे में ऐसी कल्पना करता है कि मैं इनको करता हूँ, तो दूसरे की कल्पना करने से मेरी क्या हानि हो सकती है ॥ १ ॥

अब इस विषे दृष्टांत कहते हैं—

गुंजपुंजादि दह्येत नान्यारोपितवह्निना । नान्यारोपितसंसारधर्मनिवमहं भजे ॥ २ ॥

अर्थात् जाड़े के दिनों में वन विषे जब कि बंदरों को सरदी लगती है, तब वह घुँघची का ढेर लगाकर उसके पास मिल करके बैठ जाते हैं और घुँघचियों के, याने गुंजा के, ढेर में अग्नि की मिथ्या कल्पना करते हैं। कारण यह है कि मिलकर बैठने से उनमें गरमी उत्पन्न होती है, पर वे

७२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

यह जानते हैं कि इस गुंजे के पुंज से हम सबको गरमी आ रही है। जैसे गुंजा में बंदरों करके कल्पना की हुई अग्नि दाह का कारण नहीं हो सकती है, वैसे ही मूर्ख अज्ञानियों करके कल्पना किये हुए खान पानादि व्यवहार भी विद्वान् की हानि नहीं कर सकते हैं । क्योंकि विद्वान् वास्तव में अकर्ता और अभोक्ता है । उसकी दृष्टि में न तो देहादिक हैं, और न उनके कर्तृत्व और भोक्तृत्व धर्म हैं, किन्तु वे असंग एवं चैतन्य-स्वरूप हैं ।

प्रश्न—अविवेकी विवेकिकों को जीने की इच्छा क्यों होती है ?

उत्तर—जो उनके जीने की इच्छा है यही उनका बंध है, जीने की इच्छा करके ही अविवेकी पुरुष अनर्थों को करते हैं, विवेकी पुरुष नहीं करते हैं । इस वास्ते जनकजी कहते हैं कि मेरे जीने की और मरने की इच्छा भी नहीं है । क्योंकि जीने-मरने की इच्छा, ये सब अंतःकरण के धर्म हैं, मुझ असंग चैतन्य-स्वरूप आत्मा के धर्म नहीं हैं ॥ २२ ॥

मूलम् ।

अहो भुवनकल्लोलैर्विचित्रैर्द्वाक् समुत्थितम् । मय्यनन्तमहाम्भोथौ चित्तवाते समुद्यते ॥ २३ ॥

पदच्छेदः ।

अहो, भुवनकल्लोलैः, विचित्रः, द्राक्, समुत्थितम्, मयि, अनन्तमहाम्भोथौ, चित्तवाते, समुद्यते ॥

दूसरा प्रकरण । ७३

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
अहो =आश्चर्य है किविचित्रैः =अनेक प्रकार के
अनन्तमहा-<br>म्भोदौ =अपार समुद्र रूपभुवनकल्लोलैः =जगत् रूपी तरंगों के साथ
मयि =मुझ विषेमम =मेरी
चित्तवाते<br>समुद्यते =चित्त रूपी पवन के उठने पर भीद्राक् =अत्यन्त
समुत्थितम् =अभिन्नता है ॥

भावार्थ ।

जनकजी कहते हैं कि जैसे वायु चलने से समुद्र में बड़े-छोटे अनेक प्रकार के तरंग उत्पन्न होते हैं, और वायु के स्थित होने से वे तरंग लय हो जाते हैं, तैसे आत्मा-रूपी महान् समुद्र में चित्त-रूपी वायु के वेग से अनेक ब्रह्मांड-रूपी तरंग उत्पन्न होते हैं, और चित्त के शान्त होने से वे लय हो जाते हैं और जैसे समुद्र के तरंग समुद्र से ही उत्पन्न होते हैं और समुद्र में ही लय हो जाते हैं, और समुद्र के तरंग जैसे समुद्र से भिन्न नहीं हैं, वैसे ब्रह्मांड-रूपी अनेक तरंग भी मेरे से भिन्न नहीं हैं । मेरे से उत्पन्न होते हैं और मेरे में ही लय होते हैं, क्योंकि सब मेरे में ही कल्पित हैं । कल्पित पदार्थ अधिष्ठान से भिन्न नहीं होता है ॥ २३ ॥

मूलम् ।

मय्यनन्तमहाम्भोधौ चित्तवाते प्रशाम्यति ।
अभाग्याज्जीववणिजो जगत्पोतो विनश्वरः ॥ २४ ॥

७४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

पदच्छेदः ।
मयि, अनन्त, महाम्भोborder, चित्तवाते, प्रशाम्यति,
अभाग्यात्, जीववणिकः, जगत्पोतः, विनश्वरः ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
अनन्त महाम्भोborder = अपार समुद्र-रूपअभाग्यात् = अभाग्य से
मयि = मुझ विषेजगत्पोतः = जगत्-रूपी नौका अर्थात् शरीर
$\begin{matrix} \textbf{चित्तवाते} \ \textbf{प्रशाम्यति} \end{matrix} \mathbf{=}चित्त-रूपी पवन के शान्त होने परविनश्वरः = नाश हुआ है ॥
जीववणिजः = जीव-रूपी वणिग् के

भावार्थ ।
जनकजी कहते हैं कि मुझ अनंत महान् में जब संकल्प-विकल्पात्मक मन-रूपी वायु शान्त हो जाता है, अर्थात् जब मन संकल्पादिकों से रहित होता है, तब जीव-रूपी व्यापारी की शरीर-रूपी नौका प्रारब्धकर्म-रूपी नदी के क्षय होने पर नाश हो जाती है ॥ २४ ॥

मूलम् ।
मय्यनन्तमहाम्भोधावाश्चर्यं जीववीचयः ।
उद्यन्ति घ्नन्ति खेलन्ति प्रविशन्ति स्वभावतः ॥ २५ ॥

पदच्छेदः ।
मयि, अनन्तमहाम्भोborder, आश्चर्यम्, जीववीचयः,
उद्यन्ति, घ्नन्ति, खेलन्ति, प्रविशन्ति, स्वभावतः ॥

दूसरा प्रकरण । ७५

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
आश्चर्यम् =आश्चर्य्य है किघ्नन्ति =परस्पर लड़ती हैं
मयि =मुझच =और
अनन्तम हाम्भोधा=$अपार समुद्र विषेखेलन्ति =खेलती हैं
+ च =और
जीववीचयः =जीव-रूपी तरंगेंस्वभावतः =स्वभाव से
उद्यन्ति =उठती हैंप्रविशन्ति =लय होती हैं ॥

भावार्थ ।

अबाधितानुवृत्ति करके अपने में संपूर्ण व्यवहार को देखते हुए जनकजी कहते हैं—

**प्रश्न—**बाधिता अनुवृत्ति का क्या अर्थ है ?

**उत्तर—**बाधित हुए पदार्थ की जो पुनः अनुवृत्ति अर्थात् प्रतीति है, उसका नाम बधितानुवृत्ति है !

दृष्टांत ।

जैसे एक पुरुष किसी वृक्ष के नीचे, गर्मी के दिनों में, दोपहर के समय बैठा था । उसको प्यास लगी । वह पानी की खोज करने लगा । तब उसको दूर से जल दिखाई दिया । वह उस जल के पीने के वास्ते जब गया, तब उसको जल न मिला । क्योंकि रेत में जो सूर्य की किरणें पड़ती थीं, वे ही दूर से जल रूप होकर दिखाई पड़ती थीं । उसने जान लिया कि यह रेत ही मुझको भ्रम करके जल दिखाई देता था, वह तो जल है नहीं, तब वह लौट करके उसी वृक्ष के नीचे आकर बैठ गया । और फिर उसको वही रेता किरण के सम्बन्ध से चमकता हुआ जल-रूप से दिखाई देने

७६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

लगा, परन्तु वह पुरुष जल की इच्छा करके वहाँ न गया, क्योंकि उसको निश्चय हो गया कि यह जल नहीं है, दूरत्व दोष से और किरण के सम्बन्ध से मुझको जल दिखाई देता है। पुरुष के यथार्थ ज्ञान करके बाधित हुए पर भी जल-ज्ञान की जो पुनः अनुवृत्ति अर्थात् प्रतीति है, उसी का नाम बाधिता अनुवृत्ति है।

दाष्टांत ।

आत्मा के अज्ञान करके जो जगत् सत्य की तरह प्रतीत होता था, उसके सत्यवत् ज्ञान का बाध आत्मा के ज्ञान से भी हो गया, तथापि उसकी अनुवृत्ति अर्थात् पुनः जो उसकी प्रतीति विद्वान् को होती है, वही बाधिता अनुवृत्ति कही जाती है। वह प्रतीति विद्वान् की कुछ हानि नहीं कर सकती है, क्योंकि विद्वान् उसको असत्य जानकर उसमें फिर आसक्ति नहीं करता है, किंतु मिथ्या जानकर अपने आत्मानन्द में ही मग्न रहता है।

जनकजी कहते हैं कि क्रिया से रहित, निर्विकार, आत्मा-रूपी महान् समुद्र में जीव-रूपी वीचियाँ अर्थात् अनेक तरङ्गैं उत्पन्न होती हैं और परस्पर अध्यास से वे जीव आपस में मारपीट करते हैं, खेलते हैं, लड़ते हैं। जैसे स्वप्ने के मारे जीव स्वप्न में परस्पर विरोधादिकों को करते हैं और जब उनके अविद्यादि का नाश हो जाता है, तब फिर मेरे असली स्वरूप में ही लय हो जाते हैं। फिर अविद्यादिकों करके उत्पन्न होते हैं, फिर लय होते हैं और जैसे घट-रूप उपाधि की उत्पत्ति से घटाकाश में उत्पत्ति

दूसरा प्रकरण । ७७

व्यवहार होता है और घट-रूपी उपाधि के नाश होने से घटाकाश में नाश का व्यवहार होता है, वास्तव में आकाश की न तो उत्पत्ति होती है और न नाश होता है, वैसे ही शरीरस्थ आत्मा की भी न उत्पत्ति होती है, और न नाश होता है । ज्ञानवान् को बाधितानुवृत्ति करके जगत् की प्रतीति भी होती है, तब भी उसकी कोई हानि नहीं है ॥ २५ ॥

इति श्रीअष्टावक्रगीतायां द्वितीयं प्रकरणं समाप्तम् ।

—:०:—

तीसरा प्रकरण (आत्मज्ञान-महिमा)

तीसरा प्रकरण ।

—:०:—

मूलम् ।
अविनाशिनमात्मानमेकं विज्ञाय तत्त्वतः ।
तवात्मज्ञस्य धीरस्य कथमर्थार्जने रतिः ॥ १ ॥

पदच्छेदः ।
अविनाशिनम्, आत्मानम्, एकम्, विज्ञाय, तत्त्वतः, तव, आत्मज्ञस्य, धीरस्य, कथम्, अर्थार्जने, रतिः ॥

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
एकम् =अद्वैतआत्मज्ञस्य =आत्मज्ञानी
अविनाशिनम् =अविनाशीधीरस्य =धीर को
आत्मानम् =आत्मा कोकथम् =क्यों
तत्त्वतः =यथार्थअर्थार्जने =धन के संपादन करने में
विज्ञाय =जान करके
तव =तुझरति =प्रीति है ॥

भावार्थ ।
जनकजी के अनुभव की परीक्षा करके अष्टावक्रजी फिर उसकी परीक्षा करते हैं—
अष्टावक्रजी कहते हैं कि हे जनक ! नाश से रहित, निर्विकल्प, काल-परिच्छेद से रहित, देश-परिच्छेद से रहित, वस्तु-परिच्छेद से रहित, द्वैतभाव से रहित, चैतन्य-स्वरूप आत्मा को जान करके फिर तुझ धीर की व्यावहारिक धन