भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

पृष्ठ 82, कुल 405 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 82

दूसरा प्रकरण । ७५

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
आश्चर्यम् =आश्चर्य्य है किघ्नन्ति =परस्पर लड़ती हैं
मयि =मुझच =और
अनन्तम हाम्भोधा=$अपार समुद्र विषेखेलन्ति =खेलती हैं
+ च =और
जीववीचयः =जीव-रूपी तरंगेंस्वभावतः =स्वभाव से
उद्यन्ति =उठती हैंप्रविशन्ति =लय होती हैं ॥

भावार्थ ।

अबाधितानुवृत्ति करके अपने में संपूर्ण व्यवहार को देखते हुए जनकजी कहते हैं—

**प्रश्न—**बाधिता अनुवृत्ति का क्या अर्थ है ?

**उत्तर—**बाधित हुए पदार्थ की जो पुनः अनुवृत्ति अर्थात् प्रतीति है, उसका नाम बधितानुवृत्ति है !

दृष्टांत ।

जैसे एक पुरुष किसी वृक्ष के नीचे, गर्मी के दिनों में, दोपहर के समय बैठा था । उसको प्यास लगी । वह पानी की खोज करने लगा । तब उसको दूर से जल दिखाई दिया । वह उस जल के पीने के वास्ते जब गया, तब उसको जल न मिला । क्योंकि रेत में जो सूर्य की किरणें पड़ती थीं, वे ही दूर से जल रूप होकर दिखाई पड़ती थीं । उसने जान लिया कि यह रेत ही मुझको भ्रम करके जल दिखाई देता था, वह तो जल है नहीं, तब वह लौट करके उसी वृक्ष के नीचे आकर बैठ गया । और फिर उसको वही रेता किरण के सम्बन्ध से चमकता हुआ जल-रूप से दिखाई देने