भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

पृष्ठ 81, कुल 405 में से

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पृष्ठ 81

७४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

पदच्छेदः ।
मयि, अनन्त, महाम्भोborder, चित्तवाते, प्रशाम्यति,
अभाग्यात्, जीववणिकः, जगत्पोतः, विनश्वरः ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
अनन्त महाम्भोborder = अपार समुद्र-रूपअभाग्यात् = अभाग्य से
मयि = मुझ विषेजगत्पोतः = जगत्-रूपी नौका अर्थात् शरीर
$\begin{matrix} \textbf{चित्तवाते} \ \textbf{प्रशाम्यति} \end{matrix} \mathbf{=}चित्त-रूपी पवन के शान्त होने परविनश्वरः = नाश हुआ है ॥
जीववणिजः = जीव-रूपी वणिग् के

भावार्थ ।
जनकजी कहते हैं कि मुझ अनंत महान् में जब संकल्प-विकल्पात्मक मन-रूपी वायु शान्त हो जाता है, अर्थात् जब मन संकल्पादिकों से रहित होता है, तब जीव-रूपी व्यापारी की शरीर-रूपी नौका प्रारब्धकर्म-रूपी नदी के क्षय होने पर नाश हो जाती है ॥ २४ ॥

मूलम् ।
मय्यनन्तमहाम्भोधावाश्चर्यं जीववीचयः ।
उद्यन्ति घ्नन्ति खेलन्ति प्रविशन्ति स्वभावतः ॥ २५ ॥

पदच्छेदः ।
मयि, अनन्तमहाम्भोborder, आश्चर्यम्, जीववीचयः,
उद्यन्ति, घ्नन्ति, खेलन्ति, प्रविशन्ति, स्वभावतः ॥

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