अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 70, कुल 405 में से
संदर्भ में पढ़ेंदूसरा प्रकरण । ६३
साथ सम्बन्ध कैसे हो सकता है, पर देखने में आता है और लोक भी कहते हैं कि हम बड़े दुःखी हैं ?
उत्तर—निरञ्जन आत्मा को भी द्वैत भ्रम से दुःख प्रतीत होता है, वास्तव में वह दुःखी नहीं ।
प्रश्न—इस भ्रम-रूपी महान् व्याधि की ओषधि क्या है ?
उत्तर—जो द्वैत प्रतीत हो रहा है, यह सब मिथ्या है । वास्तव में सत्य नहीं है । वास्तव में सत्यबोध-रूप आत्मा ही है, ऐसा जो ज्ञान है, वही त्रिविध दुःख की निवृत्ति की ओषधि है, और कोई उसकी ओषधि नहीं है ॥ १६ ॥
मूलम् ।
बोधमात्रोऽहमज्ञानादुपाधिः कल्पितो मया । एवं विमृश्यतो नित्यं निर्विकल्पे स्थितिर्मम ॥ १७ ॥
पदच्छेदः ।
बोधमात्रः, अहम्, अज्ञानात्, उपाधिः, कल्पितः, मया, एवम्, विमृश्यतः, नित्यम्, निर्विकल्पे, स्थितिः, मम ॥
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
|---|---|
| अहम्=मैं | एवम्=इस प्रकार |
| बोधमात्रः=बोध-रूप हूँ | नित्यम्=नित्य |
| मया=मुझ करके | विमृश्यतः=विचार करते हुए |
| अज्ञानात्=अज्ञान से | मम=मेरा |
| उपाधिः=उपाधि | स्थितिः=स्थिति |
| कल्पितः=कल्पना किया गया है | निर्विकल्पे=निर्विकल्प में है ॥ |