अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
पृष्ठ 69, कुल 405 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 69
६२ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
भावार्थ ।
जनकजी कहते हैं कि ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय; यह जो त्रिपुटी-रूप है, सो भी वास्तव में नहीं है, किन्तु अज्ञान करके चेतन में ये तीनों प्रतीत होते हैं। वास्तव में चेतन का इनके साथ भी कोई सम्बन्ध नहीं है। जो माया और माया के कार्य से रहित चेतन आत्मा है, सो मैं ही हूँ ॥१५॥
मूलम् ।
द्वैतमूलमहो दुःखं नान्यत्तस्यास्ति भेषजम् ।
दृश्यमेतन्मृषा सर्वमेकोऽहं चिद्रसोऽमलः ॥ १६ ॥
पदच्छेदः ।
द्वैतमूलम्, अहो, दुःखम्, न, अन्यत्, तस्य, अस्ति, भेषजम्, दृश्यम्, एतत्, मृषः, सर्वम्, एकः, अहम्, चिद्रसः, अमलः ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| अहो = | आश्चर्य्य है कि | एतत् = | यह |
| द्वैतमूलम् = | द्वैत है मूलकारण जिसका, ऐसा | सर्वम् = | सब |
| यत् = | जो | दृश्यम् = | दृश्य |
| दुःखम् = | दुःख है | मृषा = | झूठ है |
| तस्य = | उसकी | अहम् = | मैं |
| भेषजम् = | ओषधि | एकः = | एक अद्वैत |
| अन्यतः = | कोई | अमलः = | शुद्ध |
| अस्ति = | नहीं है | चिद्रसः = | चैतन्य-रस हूँ |
भावार्थ ।
प्रश्न—जब आत्मा निरञ्जन है, तब उसका दुःख के