अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 71, कुल 405 में से
संदर्भ में पढ़ें६४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
भावार्थ ।
**प्रश्न—**यह जो द्वैत-प्रपंच का अध्यास है, इसका उपादान कारण कौन है ?
**उत्तर—**जनकजी कहते हैं कि नित्य ज्ञान-स्वरूप जो मैं हूँ, सो मैं ही अज्ञान द्वारा सारे प्रपंच का उपादान कारण हूँ अथवा अज्ञान के सहित जो कल्पित सारा प्रपंच है, उसका अधिष्ठान-रूप होने से मैं ही उपादान कारण हूँ । विचार के विना जो सब मिथ्या प्रपंच सत्य की तरह प्रतीत होता था, सो नित्य विचार करने से असत्य भान होने लगा । अब अपने स्वरूप चैतन्य में प्राप्त होकर जीवन्मुक्ति को प्राप्त हुआ हूँ ॥ १७ ॥
मूलम् ।
अहो मयि स्थितं विश्वं वस्तुतो न मयि स्थितम् ।
न मे बन्धोऽस्तिमोक्षो वा भ्रान्तिः शान्तानिराश्रया ॥ १८ ॥
पदच्छेदः ।
अहो, मयि, स्थितम्, विश्वम्, वस्तुतः, न, मयि, स्थितम्,
न, मे, बन्धः, अस्ति, मोक्षः, वा, भ्रान्तिः, शान्ता, निराश्रया ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| मे= | मेरा | न= | नहीं |
| बन्धः= | बन्ध | अस्ति= | है |
| वा= | या | अहो= | आश्चर्य है कि |
| मोक्षः= | मोक्ष | मयि= | मेरे में स्थित हुआ |