अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 72, कुल 405 में से
संदर्भ में पढ़ेंदूसरा प्रकरण । ६५
विश्वम्=जगत्
वस्तुतः=वास्तव में
मयि=मेरे विषे
न=नहीं
स्थितम्=स्थित है
| + इतिविचारतः=ऐसे विचार से
निराश्रया=आश्रयरहित
भ्रान्ति=भ्रान्ति
शान्ता=शान्त हुई है ॥
भावार्थ ।
**प्रश्न—**मुक्ति क्या पदार्थ है ?
**उत्तर—**आनन्दात्मकब्रह्मावाप्तिश्च मोक्षः ।
आनंद-स्वरूप आत्मा की प्राप्ति का नाम ही मुक्ति है ।
**प्रश्न—**यदि पूर्वोक्त मुक्ति को विचार से जन्य मानोगे, तब मुक्ति भी अनित्य हो जावेगी, क्योंकि जो-जो उत्पत्ति-वाला पदार्थ होता है, सो-सो अनित्य होता है—ऐसा नियम है । यदि मुक्ति को विचार से अजन्य मानोगे, तब फिर विचार से रहित पुरुषों की भी मुक्ति होनी चाहिए ?
**उत्तर—**जनकजी कहते हैं कि वास्तव में तो मेरे में न बंध है, न मोक्ष है, क्योंकि मैं नित्य चैतन्य-स्वरूप हूँ ।
**प्रश्न—**जब कि वास्तविक तुम्हारे में बन्ध और मोक्ष कोई नहीं है, तब फिर शास्त्र के विचार का और गुरु के उपदेश का क्या फल हुआ ?
**उत्तर—**जो देहादिकों में चित्रकार की आत्म-भ्रान्ति हो रही है, 'मैं देह हूँ' 'मैं इन्द्रिय हूँ' 'मैं ब्राह्मण हूँ' 'मैं कर्त्ता और भोक्ता-हूँ-' इस भ्रान्ति की जो निवृत्ति है—'न मैं देह हूँ'; और 'न इन्द्रिय हूँ'; 'न मैं ब्राह्मणत्वादि जाति-वाला हूँ'; 'न मैं कर्त्ता और भोक्ता हूँ' किंतु देहादिक से परे इन सबका मैं साक्षी, शुद्ध ज्ञान-स्वरूप हूँ—ऐसा अपने