भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

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६६ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

स्वरूप का जो यथार्थ बोध है, यही शास्त्र विचार का और गुरु के उपदेश का फल है।
जनकजी कहते हैं कि अहो ! बड़ा आश्चर्य है कि मेरे में स्थित भी संपूर्ण विश्व वास्तव में, तीनों कालों में मेरे में नहीं है—ऐसा विचार करने से मेरी भ्रान्ति दूर हो गई है ॥ १८ ॥

मूलम् ।

सशरीरमिदं विश्वं न किञ्चिदिति निश्चितम् ।
शुद्धचिन्मात्रआत्मा च तत्कस्मिन्कल्पनाऽऽधुना ॥ १९ ॥

पदच्छेदः ।

सशरीरम्, इदम्, विश्वम्, न, किञ्चित्, इति, निश्चितम्, शुद्धचिन्मात्रः, आत्मा, च, तत्, कस्मिन्, कल्पना, अधुना ॥

अन्वयः । शब्दार्थ ।अन्वयः । शब्दार्थ ।
सशरीरम् = शरीर सहितइति = ऐसा
इदम् = यहयदा = जब
विश्वम् = जगत्निश्चितम् = निश्चय हुआ
किञ्चित् न = कुछ नहीं है अर्थात् न सत् है, और न असत् हैतदा = तब
कस्मिन् = किस विषे
= औरअधुना = अब
शुद्धचिन्मात्र = शुद्ध चैतन्य-मात्रकल्पना = विश्व की कल्पना होवे ॥

भावार्थ ।

**प्रश्न—**रज्जु-रूप अधिष्ठान के विद्यमान रहते हुए, कभी न कभी मंद अंधकार में फिर भी सर्प का भ्रम हो