अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
पृष्ठ 74, कुल 405 में से
संदर्भ में पढ़ेंदूसरा प्रकरण । ६७
सकता है, वैसे अधिष्ठान चेतन के होते हुए भो मुक्ति में कभी न कभी प्रपंच भी हो जावेगा ?
उत्तर—शरीर के सहित यह विश्व किंचित् भी सत्य नहीं है, और असत्य है, किन्तु अनिर्वचनीय अज्ञान का कार्य होने से अनिर्वचनीय है । उस अनिर्वचनीय की अज्ञान की निवृत्ति होने से उसके कार्य विश्व की भी निवृत्ति हो जाती है । अज्ञान ही कल्पित विश्व का कारण था, उसके नाश हो जाने से फिर मुक्त पुरुष में विश्व उत्पन्न नहीं होता है । जैसे मंद अंधकार के दूर होने से फिर सर्प की भ्रान्ति भी नहीं होती है, वैसे प्रकाश-स्वरूप आत्मा के ज्ञान से फिर कदापि विश्व की उत्पत्ति नहीं होती है ॥ १९ ॥
मूलम् ।
शरीरं स्वर्गनरकौ बन्धमोक्षौ भयं तथा । कल्पनामात्रमेवैतत्किंमे कार्यं चिदात्मनः ॥ २० ॥
पदच्छेदः ।
शरीरम्, स्वर्गनरकौ, बन्धमोक्षौ, भयम्, तथा कल्पना- मात्रम्, एव, एतत्, किम्, कार्यम्, चिदात्मनः ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| एतत् = | यह | एव = | निःसंदेह |
| शरीरम् = | शरीर | कल्पनामात्रम् = | कल्पना-मात्र है |
| स्वर्गनरकौ = | स्वर्ग और नरक | मे चिदात्मनः = | मुझ चैतन्य आत्मा को |
| बन्धमोक्षौ = | बन्ध और मोक्ष | ||
| तथा = | और | किम् = | क्या |
| भयम् = | भय | कार्यम् = | कर्त्तव्य है । |