अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
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तीसरा प्रकरण । ८३
मूलम् ।
आस्थितः परमाद्वैतं मोक्षार्थेऽपि व्यवस्थितः । आश्चर्यं कामवशगो विकलः केलिशिक्षया ॥ ६ ॥
पदच्छेदः ।
आस्थितः, परमाद्वैतम्, मोक्षार्थे, अपि, व्यवस्थितः, आश्चर्यम्, कामवशगः, विकलः, केलिशिक्षया ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| परमाद्वैतम् | = परम अद्वैत को | कामवशगः | = काम के वश होकर |
| आस्थितः | = आश्रय किया हुआ | केलिशिक्षया | = क्रीड़ा के अभ्यास से |
| + च | = और | विकलः | = व्याकुल होता है |
| मोक्षार्थे अपि | = मोक्ष के लिये भी | आश्चर्यम् | = यही आश्चर्य है ॥ |
| व्यवस्थितः | = उद्यत हुआ पुरुष |
भावार्थ ।
जिसने सजातीय और विजातीय स्वगत-भेद से शून्य अद्वैत आत्मा का साक्षात्कार कर लिया है, और सच्चिदानन्द आत्मा में जिसकी निष्ठा हो चुकी है । यदि फिर वह पुरुष काम के वश होकर नाना प्रकार की क्रीड़ा करता हुआ दिखाई पड़े, तो महान् आश्चर्य है ॥ ६ ॥
मूलम् ।
उद्भूतं ज्ञानदुर्मित्रमवधार्यातिदुर्बलः । आश्चर्यं काममाकाङ्क्षेत्कालमन्तमनुश्रितः ॥ ७ ॥