अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
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८४ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
पदच्छेदः ।
उद्भूतम्, ज्ञानदुर्मित्रम्, अवधार्य, अतिदुर्बलः, आश्चर्यम्, कामम्, आकाङ्क्षेत्, कालम्, अन्तम्, अनुश्रितः ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| उद्भूतम् = | उत्पन्न हुए | अन्तं कालम् = | अन्तकाल को |
| ज्ञानदुर्मित्रम् = | ज्ञान के शत्रु काम को | अनुश्रितः = | आश्रय करता हुआ पुरुष |
| अवधार्य = | धारण करके | कामम् = | कामना को |
| अतिदुर्बलः = | दुर्बल होता हुआ | आकाङ्क्षेत् = | इच्छा करता है |
| च = | और | आश्चर्यम् = | यही आश्चर्य है ॥ |
भावार्थ ।
जो ज्ञानी पुरुष काम को ज्ञान का अत्यन्त वैरी जानता हुआ फिर भी काम की इच्छा करे, तो इससे बढ़कर क्या आश्चर्य है । जैसे मृत्यु करके ग्रसित हुए पुरुष को समीपवर्ती विषय-भोग की इच्छा नहीं होती है—वैसे ही विवेकी पुरुष को भी विषय-भोग की इच्छा न होनी चाहिए ॥ ७ ॥
मूलम् ।
इहामुत्र विरक्तस्य नित्यानित्यविवेकिनः ।
आश्चर्यं मोक्षकामस्य मोक्षादेव विभीषिका ॥ ८ ॥
पदच्छेदः ।
इह, अमुत्र, विरक्तस्य, नित्यानित्यविवेकिनः, आश्चर्यम्, मोक्षकामस्य, मोक्षात्, एव, विभीषिका ॥