अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
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तीसरा प्रकरण । ८५
| अन्वयः । शब्दार्थ । | अन्वयः । शब्दार्थ । |
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| इह = { इस लोक के भोग विषे | च = और |
| +च = और | मोक्षकामस्य = { मोक्ष के चाहनेवाले पुरुष को |
| अमुत्र = { परलोक के भोग विषे | मोक्षात् एव = मोक्ष से ही |
| विरक्तस्य = विरक्त | विभीषिका = भय है |
| नित्यानित्यविवेकिनः = { नित्य और अनित्य के विचार करनेवाले | आश्चर्यम् = यही आश्चर्य है ।। |
भावार्थ । आत्मा नित्य है और शरीरादिक अनित्य हैं । इन दोनों के विवेचन करवेवाले का नाम विवेकी है। और आनन्द-रूप ब्रह्म की प्राप्ति का नाम मोक्ष है । उस मोक्ष की कामना-वाले ज्ञानी को ऐसा भय हो कि असद्रूप स्त्री, पुत्र और धनादिकों के साथ मेरा वियोग हो जायगा, तो महान् आश्चर्य है । क्योंकि स्वप्न में देखे हुए धन का जाग्रत् में नाश होने से मोह किसी को भी नहीं हुआ है ॥ ८ ॥
मूलम् । धीरस्तु भोज्यमानोऽपि पीड्यमानोऽपि सर्वदा । आत्मानं केवलं पश्यन्न तुष्यति न कुप्यति ॥ ९ ॥
पदच्छेदः । धीरः, तु, भोज्यमानः, अपि, पीड्यमानः, अपि, सर्वदा, आत्मानम्, केवलम्, पश्यन्, न, तुष्यति, न, कुप्यति ॥