भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

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तीसरा प्रकरण । ८७

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
चेष्टमानम्= चेष्टा करते हुएसः= वह
स्वम्= अपनेमहाशयः= महाशय पुरुष
शरीरम्= शरीर को आत्मा से भिन्नसंस्तवे= स्तुति में
= और
अन्यशरीरवत्= अन्य शरीर की तरहनिन्दायाम अपि= निन्दा की भी
+यः= जोकथम्= कैसे
पश्यति= देखता हैक्षुभ्येत्= क्षोभ को प्राप्त होवेगा ।।

भावार्थ ।

जैसे दूसरे का शरीर अपने आत्मा से भिन्न चेष्टा का आश्रय है, वैसे अपना शरीर भी अपने आत्मा से भिन्न चेष्टा का आश्रय है। इस प्रकार जो ज्ञानी देखता है, वह अपनी स्तुति में हर्ष को और निंदा में क्षोभ को कदापि प्राप्त नहीं होता है। यदि वह हर्ष और क्षोभ को प्राप्त होवे, तो वह ज्ञानवान् नहीं है ॥ १० ॥

मूलम् ।

मायामात्रमिदं विश्वं पश्यन् विगतकौतुकः ।
अपि सन्निहिते मृत्यौ कथं त्रस्यति धीरधीः ॥ ११ ॥

पदच्छेदः ।

मायामात्रम्, इदम्, विश्वम्, पश्यन्, विगतकौतुकः, अपि, सन्निहिते, मृत्यौ, कथम्, त्रस्यति, धीरधीः ॥