अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
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८८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| विगतकौतुकः = | दूर हो गई है अज्ञानता जिसकी, ऐसा | पश्यन् = | देखता हुआ |
| मृत्यौ सन्नि-हिते अपि = | मृत्यु के आने पर भी | ||
| धीरधीः = | धीर पुरुष | कथम् = | क्यों |
| इदम् विश्वम् = | इस विश्व को | त्रस्यति = | डरेगा ॥ |
| मायामात्रम् = | माया-रूप |
भावार्थ ।
यह जो दृश्यमान जगत् है, सो सब माया का कार्य है । और माया का कार्य होने से ही वह सब मिथ्या है । जो ज्ञानी उसको मिथ्या देखता है, वह फिर ऐसा विचार नहीं करता है कि कहाँ से ये शरीरादिक उत्पन्न होते हैं और नाश होकर किसमें लय हो जाते हैं । यदि ऐसा विचार करके वह मोह को प्राप्त होवे, तो वह ज्ञानी नहीं हो सकता है । जो विद्वान् अपने स्वरूप में अचल है, वह मृत्यु के समीप अपने पर भी भय को नहीं प्राप्त होता है ॥११॥
मूलम् ।
निःस्पृहं मानसं यस्य नैराश्येऽपि महात्मनः ।
तस्यात्मज्ञानतृप्तस्य तुलना केन जायते ॥ १२ ॥
पदच्छेदः ।
निःस्पृहम्, मानसम्, यस्य, नैराश्ये, अपि, महात्मनः,
तस्य, आत्मज्ञानतृप्तस्य, तुलना, केन, जायते ॥