भारतकोश
अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता

Ashtavakra Gita

महर्षि अष्टावक्र द्वारा

स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)

DevanagariHindipublished405 पृष्ठ

पृष्ठ 95, कुल 405 में से

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पृष्ठ 95

८८ अष्टावक्र-गीता भा० टी० स०

अन्वयः ।शब्दार्थ ।अन्वयः ।शब्दार्थ ।
विगतकौतुकः =दूर हो गई है अज्ञानता जिसकी, ऐसापश्यन् =देखता हुआ
मृत्यौ सन्नि-हिते अपि =मृत्यु के आने पर भी
धीरधीः =धीर पुरुषकथम् =क्यों
इदम् विश्वम् =इस विश्व कोत्रस्यति =डरेगा ॥
मायामात्रम् =माया-रूप

भावार्थ ।

यह जो दृश्यमान जगत् है, सो सब माया का कार्य है । और माया का कार्य होने से ही वह सब मिथ्या है । जो ज्ञानी उसको मिथ्या देखता है, वह फिर ऐसा विचार नहीं करता है कि कहाँ से ये शरीरादिक उत्पन्न होते हैं और नाश होकर किसमें लय हो जाते हैं । यदि ऐसा विचार करके वह मोह को प्राप्त होवे, तो वह ज्ञानी नहीं हो सकता है । जो विद्वान् अपने स्वरूप में अचल है, वह मृत्यु के समीप अपने पर भी भय को नहीं प्राप्त होता है ॥११॥

मूलम् ।

निःस्पृहं मानसं यस्य नैराश्येऽपि महात्मनः ।
तस्यात्मज्ञानतृप्तस्य तुलना केन जायते ॥ १२ ॥

पदच्छेदः ।

निःस्पृहम्, मानसम्, यस्य, नैराश्ये, अपि, महात्मनः,
तस्य, आत्मज्ञानतृप्तस्य, तुलना, केन, जायते ॥

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