अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
पृष्ठ 98, कुल 405 में से
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तीसरा प्रकरण । ९१
पदच्छेदः ।
अन्तस्त्यक्तकषायस्य, निर्द्वन्द्वस्य, निराशिषः, यदृच्छया, आगतः, भोगः, न, दुःखाय, च, तुष्टये ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| अन्तस्त्यक्त-कषायस्य = | अन्तःकरण से त्याग दिया है विषय-वासना के कषाय को जिसने | यदृच्छया = | दैवयोग से |
| आगतः = | प्राप्त हुई | ||
| +एवं = | जो | भोगः = | वस्तु |
| निर्द्वन्द्वस्य = | द्वन्द्व से रहित है | न दुःखाय = | न दुःख के लिये है ॥ |
| +तथा = | जो | च = | और |
| निराशिषः = | आशा-रहित है, ऐसे पुरुष को | न तुष्टये = | न संतोष के लिये है ॥ |
भावार्थ ।
जिस विद्वान् ने अन्तःकरण के मलों को दूर कर दिया है, वह शीत उष्णादिक द्वन्द्वों से अर्थात् शीत और उष्णजन्य सुख-दुःखादि से भी रहित है । और नष्ट हो गई हैं सम्पूर्ण विषय-वासनाएँ जिसकी, ऐसा जो समचित्त विद्वान् है, उसको दैवयोग से प्राप्त हुए जो भोग हैं, उनको प्रारब्धवश भोगता हुआ भी हर्ष और शोक को नहीं प्राप्त होता है ॥ १४ ॥
इति श्रीअष्टावक्रगीतायां तृतीयं प्रकरणं समाप्तम् ।
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