अष्टावक्र गीता

अष्टावक्र गीता
Ashtavakra Gita
महर्षि अष्टावक्र द्वारा
स्रोत: Gita Press Gorakhpur · Gita Press Gorakhpur (उद्गम)
DevanagariHindipublished405 पृष्ठ
पृष्ठ 99, कुल 405 में से
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चौथा प्रकरण ।
—:०:—
मूलम् ।
हन्तात्मज्ञस्य धीरस्य खेलतो भोगलीलया ।
न हि संसारवाहीकैर्मूढैः सह समानता ॥ १ ॥
पदच्छेदः ।
हन्त, आत्मज्ञस्य, धीरस्य, खेलतः, भोगलीलया, न, हि, संसार, वाहीकै, मूढैः, सह, समानता ॥
| अन्वयः । | शब्दार्थ । | अन्वयः । | शब्दार्थ । |
|---|---|---|---|
| हन्त = | यथार्थ है कि | समानता = | बराबरी |
| भोगलीलया = | भोगलीला से | संसारवाहीकैः = | संसार से लिप्त |
| खेलतः = | खेलते हुए | मूढैः सह = | मूढ़ पुरुषों के साथ |
| आत्मज्ञस्य = | आत्म-ज्ञानी | न हि = | कदापि नहीं हो सकती है ॥ |
| धीरस्य = | धीर पुरुष की |
भावार्थ ।
तृतीय प्रकरण में जो गुरु ने शिष्य की परीक्षा के लिये ज्ञानी के ऊपर आक्षेप किये हैं, अब उन आक्षेपों के उत्तरों को शिष्य कहता है—
प्रारब्ध से और वाधिताऽनुवृत्ति करके सम्पूर्ण व्यवहारों को करता हुआ भी ज्ञानी दोष को प्राप्त नहीं होता है । जनकजी कहते हैं कि हे भगवन् ! जिस आत्मज्ञानी विद्वान् ने सबका अधिष्ठान अपने आत्मा को जान लिया है, वह