भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

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हे स्त्री! धरती के ऊपर पड़े हुए तिनके को वायु जिस प्रकार भ्रमित करती है, मैं तेरे मन को उसी प्रकार चंचल बना दूंगा. इस से तू मुझे चाहने वाली बन जाएगी तथा मेरे पास से कहीं अन्यत्र नहीं जा सकेगी. (१) सं चेन्नयाथो अश्विना कामिना सं च वक्षथ:. सं वां भगासो अग्मत सं चित्तानि समु व्रता.. (२) हे अश्विनीकुमारो! मेरी चाही गई स्त्री को मेरे समीप ले आओ तथा मुझ कामी पुरुष से मिला दो. हम दोनों के भाग्य एक साथ मिल जाएं. हमारे मन और कर्म भी समान हों. (२) यत् सुपर्णा विवक्षवो अनमीवा विवक्षव:. तत्र मे गच्छताद्भवं शल्य इव कुल्मलं यथा.. (३) शोभन पंखों वाले कबूतर आदि पक्षी जो स्त्री विषयक बात कहने के इच्छुक होते हैं, रोग रहित कामीजन भी वही बात कहना चाहते हैं. उस विषय में किया जाता हुआ मेरा आह्वान उस कामिनी के लिए मैल भरे बाण के समान हो. अर्थात् वह मेरी बात सुन कर मेरे वश में हो जाए. (३) यदन्तरं तद् बाह्यं यद् बाह्यं तदन्तरम्. कन्यानां विश्वरूपाणां मनो गृभायौषधे.. (४) जो अर्थ मन में होता है, वही वाणी के द्वारा प्रकट होता है. बाहर वाणी के द्वारा जो बात कही जाती है, वही मनुष्य के मन में रहती है. हे जड़ीबूटी! सर्व गुण संपन्न कन्या के मन को ग्रहण करो. अर्थात् तुम्हारा लेपन करने से उस कन्या का मन मेरे वश में हो जाए. (४) एयमगन् पतिकाम जनिकामो S हमागमम्. अश्वः कनिक्रदद् यथा भगेनाहं सहागमम्.. (५) पति की अभिलाषा करती हुई यह स्त्री मेरे समीप आई थी. मैं ने भी पत्नी की कामना से इसे प्राप्त किया था. घोड़ा जिस प्रकार हिनहिनाता हुआ घोड़ी के पास जाता है, उसी प्रकार मैं इस नारी से मिला हूं. (५) सूक्त-३१ देवता—मही इन्द्रस्य या मही दृषत् क्रिमेर्विश्वस्य तर्हणी. तया पिनष्मि सं क्रिमीन् दृषदा खल्वाँ इव.. (१) सभी कीड़ों को मारने वाली जो इंद्र की शिला है, उसी शिला के द्वारा मैं शरीर के भीतर स्थित कीटाणुओं को उसी प्रकार मारता हूं, जिस प्रकार सिलबट्टे से चने पीसे जाते हैं. (१) ebook converter DEMO Watermarks*