अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंदृष्टमदृष्टमतृहंमथो कुरूरुमतृहम्. अल्गण्डून्त्सर्वान्छ्छुनान् क्रिमीन् वचसा जम्भयामसि.. (२) मैं आंखों से दिखाई देने वाले और न दिखाई देने वाले कीटाणुओं को मारता हूं. इस के अतिरिक्त शरीर के अंतर्गत जाल के समान स्थित कीटाणुओं का भी मैं विनाश करता हूं. मैं अपने मंत्र के बल से अलगंडू एवं शल्ग नाम के कीटाणुओं को तथा अन्य सभी कीटाणुओं को नष्ट करता हूं. (२) अल्गण्डून् हन्मि महता वधेन दूना अदूना अरसा अभूवन्. शिष्टानशिष्टान् नि तिरामि वाचा यथा क्रिमीणां नकिरुच्छिषातै.. (३) मैं हवन के साधन अन्न और जड़ीबूटियों के द्वारा रक्त तथा मांस को दूषित करने वाले अलगंडू नाम के कीटाणुओं का वध करता हूं. मेरी जड़ीबूटी और मेरे मंत्र के द्वारा संतप्त अथवा असंतप्त वे कीटाणु निर्जीव हो जाएं. मैं बचे हुए और पहले न मरे हुए कीटाणुओं को अपने मंत्र के द्वारा इस प्रकार मारता हूं, जिस से अनेक प्रकार के कीटाणुओं में से एक भी न बचे. (३) अन्वान्त्र्यं शीर्षण्य १ मथो पार्श्वेयं क्रिमीन्. अवस्कवं व्यध्वरं क्रिमीन् वचसा जम्भयामसि.. (४) क्रम से आंतों में होने वाले, सिर में होने वाले, तथा पसलियों में स्थित कीटाणुओं को मैं मंत्र के द्वारा नष्ट करता हूं. ये कीटाणु शरीर में प्रवेश करने वाले एवं भांतिभांति के मार्गों से गमन करने वाले हैं. (४) ये क्रिमयः पर्वतेषु वनेष्वोषधीषु पशुष्वप्स्व १ न्तः. ये अस्माकं तन्वमाविविशुः सर्वं तद्धन्मि जनिम क्रिमीणाम्.. (५) जो कीटाणु पर्वतों में, वनों में, ओषधियों में, पशुओं में तथा जल में स्थित हैं, वे घाव के द्वारा अथवा अन्न पान के द्वारा हमारे शरीर में प्रवेश कर चुके हैं. मैं इन सभी प्रकार के कीटाणुओं की उत्पत्ति समाप्त करता हूं. (५) सूक्त-३२ देवता—आदित्य उद्यन्नादित्यः क्रिमीन् हन्तु निम्रोचन् हन्तु रश्मिभिः. ये अन्त क्रिमयो गविः.. (१) उदय होते हुए तथा अस्त होते हुए सूर्य अपनी फैलने वाली किरणों के द्वारा उन कीटाणुओं का विनाश करे जो गाय के शरीर के भीतर स्थित हैं. (१) विश्वरूपं चतुरक्षं क्रिमिं सारङ्गमर्जुनम्. ebook converter DEMO Watermarks*