भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 104, कुल 1063 में से

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शृणाम्यस्य पृष्टीरपि वृश्चामि यच्छिरः.. (२) मैं नाना आकारों वाले, चार आंखों वाले, चितकबरे रंग के एवं धवल वर्ण के कीटाणुओं का विनाश करता हूं. मैं उन कीटाणुओं की पीठ और शीश का भी विनाश करता हूं. (२) अत्रिवद् वः क्रिमयो हन्मि कण्ववज्जमदग्निवत्. अगस्त्यस्य ब्रह्मणा सं पिनष्म्यहं क्रिमीन्ः.. (३) हे कीटाणुओ! मैं तुम्हें उसी प्रकार पुनः उत्पन्न न होने के लिए नष्ट करता हूं, जिस प्रकार अग्नि, कण्व और जमदग्नि ऋषि ने मंत्र की शक्ति से तुम्हारा विनाश किया था. मैं अगस्त्य ऋषि के मंत्र द्वारा सभी कीटाणुओं का विनाश करता हूं. (३) हतो राजा क्रिमीणामुतैषां स्थपतिर्हतः. हतो हतमाता क्रिमिर्हतभ्राता हतस्वसा.. (४) कीटाणुओं का राजा मारा गया एवं इन का सचिव भी मारा गया. जिन कीटाणुओं की माता, भाई और बहनें भी मारी गई थीं, वे नष्ट हो गए. (४) हतासो अस्य वेशसो हतासः परिवेशसः. अथो ये क्षुल्लका इव सर्वे ते क्रिमयो हताः.. (५) इन कीटाणुओं के कुल के निवास स्थान नष्ट हो गए एवं इन के घरों के आसपास के घर भी नष्ट हो गए. इस के अतिरिक्त जो कीटाणु बीज अवस्था में थे, वे भी नष्ट हो गए. (५) प्र ते शृणामि शृङ्गे याभ्यां वितुदायसि. भिनद्मि ते कुषुम्भं यस्ते विषधानः.. (६) हे कीटाणु! मैं तेरे उन सींगों को तोड़ता हूं, जिन के द्वारा तू व्यथा पहुंचाता है. मैं तेरे कुषुंभ नामक अंग विशेष को भी विदीर्ण करता हूं जो विष को धारण करने वाला है. (६) सूक्त-३३ देवता—यक्ष्मा का विनाश अक्षीभ्यां ते नासिकाभ्यां कर्णाभ्यां छुबुकादधि. यक्ष्मं शीर्षम्यं मस्तिष्काज्जिह्वाया वि वृहामि ते.. (१) हे यक्ष्मा रोग से पीड़ित पुरुष! मैं तेरी आंखों से, नाक से, कानों से तथा ठोड़ी से यक्ष्मा रोग को बाहर निकालता हूं. मैं तेरे सिर में से, मस्तिष्क से तथा जीभ से यक्ष्मा रोग को बाहर निकालता हूं. (१) ग्रीवाभ्यस्त उष्णिहाभ्यः कीकसाभ्यो अनूक्यत्. ebook converter DEMO Watermarks*