भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 105, कुल 1063 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 105

यक्ष्मं दोषण्य १ संसाभ्यां बाहुभ्यां वि वृहामि ते.. (२) हे यक्ष्मा रोग से पीड़ित पुरुष! मैं तेरी गरदन से, रक्त से पूर्ण नाड़ियों से, हंसली एवं सीने की हड्डियों से, संधियों से, कंधों से तथा भुजाओं से यक्ष्मा रोग को बाहर निकालता हूं. मैं बाहुओं में होने वाले यक्ष्मा रोग को भी नष्ट करता हूं. (२) हृदयात् ते परि क्लोम्नो हलीक्ष्णात् पार्श्वभ्याम्. यक्ष्मं मतस्नाभ्यां प्लीह्नो यकन्स्ते वि वृहामसि.. (३) हे रोगी! मैं तेरे हृदय से, हृदय के समीपवर्ती मांस पिंड क्लोम से, क्लोम से संबंधित हलक्षण नामक मांस पिंड से, दोनों ओर स्थित गुरदों से, तिल्ली से एवं हृदय के समीपवर्ती यकृत से यक्ष्मा रोग को बाहर निकालता हूं. (३) आन्त्रेभ्यस्ते गुदाभ्यो वनिष्ठोरुदरादधि. यक्ष्मं कुक्षिभ्यां प्लाशेर्नाभ्या वि वृहामि ते.. (४) हे यक्ष्मा रोग से पीड़ित पुरुष! मैं तेरी आंखों से, गुदा से, बड़ी आंत से, पेट से, दोनों कोखों से, अनेक छिद्रों वाले मलाशय से तथा नाभि से यक्ष्मा रोग को बाहर निकालता हूं. (४) ऊरुभ्यां ते अष्ठीवद्भ्यां पार्ष्णिभ्यां प्रपदाभ्याम्. यक्ष्मं भसद्यं १ श्रोणिभ्यां भासदं भंससो वि वृहामि ते.. (५) हे रोगी पुरुष! मैं तेरी जंघाओं से, घुटनों से, घुटनों के नीचे वाले भागों से, पैरों के पंजों से, कमर से, नितंबों से तथा गुरदों में स्थित यक्ष्मा रोग को वहां से बाहर निकालता हूं. (५) अस्थिभ्यस्ते मज्जभ्यः स्नावभ्यो धमनिभ्यः. यक्ष्मं पाणिभ्यामङ्गुलिभ्यो नखेभ्यो वि वृहामि ते.. (६) हे रोगी पुरुष! मैं हड्डियों से, चरबी से, शिराओं से, धमनियों से, हाथों से, हाथों की उंगलियों से तथा नाखूनों से यक्ष्मा रोग को बाहर निकालता हूं. (६) अङ्गेअङ्गे लोम्निलोम्नि यस्ते पर्वणिपर्वणि. यक्ष्मं त्वचस्यं ते वयं कश्यपस्य वीबर्हेण विष्वञ्चं वि वृहामसि.. (७) हे यक्ष्मा रोगी पुरुष! तेरे अंगअंग में, रोमरोम में तथा जोड़जोड़ में जो यक्ष्मा रोग है, उसे मैं कश्यप महर्षि के मंत्रों के सूक्त के द्वारा बाहर निकालता हूं. (७) सूक्त-३४ देवता—विश्वकर्मा य ईशे पशुपतिः पशूनां चतुष्पदामुत यो द्विपदाम्. ebook converter DEMO Watermarks*