अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 137, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंअर्यमणं बृहस्पतिमिन्द्रं दानाय चोदय. वातं विष्णुं सरस्वतीं सवितारं च वाजिनम्.. (७) हे स्तोता! तुम अर्यमा, बृहस्पति, इंद्र, वाणी रूपी सरस्वती एवं वेग वाले सविता देव को हमें धन देने के लिए प्रेरित करो. (७) वाजस्य नु प्रसवे सं बभूविमेमा च विश्वा भुवनान्यन्तः. उतादित्सन्तं दापयतु प्रजानन् रयिं च नः सर्ववीरं नि यच्छ.. (८) हम अन्न उत्पन्न करने वाले कर्म को शीघ्र प्राप्त करे. दिखाई देने वाले सभी प्राणी वाज प्रसव अर्थात् वृष्टि द्वारा अन्न पैदा करने वाले देव के मध्य निवास करते हैं. सभी प्राणियों के हृदय के अभिप्राय को जानने वाले वाज-प्रसव देव दान न करने वाले मुझ पुरुष को धन दान करने की प्रेरणा दें तथा हमारे धन को पुत्र, पौत्र आदि से युक्त करें. (८) दुहां मे पञ्च प्रदिशो दुहामुर्वीर्यथाबलम्. प्रापेयं सर्वा आकूतीर्मनसा हृदयेन च.. (९) पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण एवं इन की मध्यवर्ती दिशा—इस प्रकार पांच दिशाएं, पृथ्वी, आकाश, दिन, रात, जल, तथा जड़ीबूटियां मुझे अभिमत फल दें. मैं हृदय और अंतःकरण से उत्पन्न संकल्पों को प्राप्त करूं. (९) गोसनिं वाचमुदेयं वर्चसा माभ्युदिहि. आ रुन्धां सर्वतो वायुस्त्वष्टा पोषं दधातु मे.. (१०) मैं सभी प्रकार के धन देने वाली वाणी का उच्चारण करता हूं. हे वाणी रूपी देवी! तुम अपने तेज से मेरा मनचाहा फल देने के लिए आओ. वायु सभी ओर से मेरे प्राणों को आच्छादित करे तथा त्वष्टा देव मेरे शरीर को पुष्ट बनाएं. (१०) सूक्त-२१ देवता—अग्नि ये अग्नयो अप्स्व १ न्तर्ये वृत्रे ये पुरुषे ये अश्मसु. य आविवेशोषधीर्यो वनस्पतींस्तेभ्यो अग्निभ्यो हुतमस्त्वेतत्.. (१) मेघों में रहने वाली विद्युत रूपी अग्नि को, जलों में वाडव के रूप में निवास करने वाली अग्नि को, मनुष्यों के शरीर में वैश्वानर के रूप में रहने वाली अग्नि को, सूर्यकांत आदि मणियों में गेहूं, जौ, आदि फसलों में तथा वृक्षों में रहने वाली अग्नि को यह हवि प्राप्त हो. (१) यः सोमे अन्तर्यो गोष्वन्तर्य आविष्टो वयःसु यो मृगेषु. य आविवेश द्विपदो यश्चतुष्पदस्तेभ्यो अग्निभ्यो हुतमस्त्वेतत्.. (२) ebook converter DEMO Watermarks*