भारतकोश
अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Atharvaveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,063 पृष्ठ

पृष्ठ 138, कुल 1063 में से

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पृष्ठ 138

जो अग्नि सोमलता में अमृत रस का परिपाक करने के लिए रहती है, जो अग्नि गाय, भैंस आदि पशुओं में निवास कर के उन के दूध को परिपक्व करती है, जो अग्नि पक्षियों और पशुओं में प्रविष्ट है तथा जो अग्नि मनुष्यों और चौपायों में व्याप्त है. मेरे द्वारा दिया हुआ हवि उसे प्राप्त हो. (२) य इन्द्रेण सरथं याति देवो वैश्वानर उत विश्वदाव्यः. यं जोहवीमि पृतनासु सासहिं तेभ्यो अग्निभ्यो हुतमस्त्वेतत्.. (३) दान आदि गुण वाले जो अग्नि देव इंद्र के साथ एक रथ में बैठ कर गमन करते हैं, जो अग्नि मनुष्यों में वैश्वानर तथा विश्व को जलाने वाले दावाग्नि हैं, जो अग्नि देव युद्धों में शत्रु को पराजित करने वाले हैं, उन सभी अग्नियों को मेरा हवि प्राप्त हो. (३) यो देवो विश्वाद् यमु काममाहुर्यं दातारं प्रतिगृह्णन्तमाहुः. यो धीरः शक्रः परिभूरदाभ्यस्तेभ्यो अग्निभ्यो हुतमस्त्वेतत्.. (४) जो अग्नि देव सब का भक्षण करने वाले हैं, जिन्हें कामना करने योग्य तथा मनचाहा फल देने वाला कहा जाता है, जो अग्नि देव, बुद्धिमान, सभी कार्य करने में समर्थ, शत्रुओं को पराजित करने वाले तथा किसी से पराजित न होने वाले हैं, उन्हें मेरी आहुति प्राप्त हो. (४) यं त्वा होतारं मनसाभि संविदुस्त्रयोदश भौवनाः पञ्च मानवाः. वर्चोधसे यशसे सूनृतावते तेभ्यो अग्निभ्यो हुतमस्त्वेतत्.. (५) जिस से प्राणी सत्ता प्राप्त करते हैं, उस संवत्सर के तेरह महीने, मनु के द्वारा सृष्टि की आदि में कल्पित वसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद, हेमंत, पांच ऋतुएं तुम्हें देवों का आह्वान करने वाला जानते हैं, उस तेजस्वी, यशस्वी और प्रिय वाणी वाले अग्नि को यह हवि प्राप्त हो. (५) उक्षान्नाय वशान्नाय सोमपृष्ठाय वेधसे. वैश्वानरज्येष्ठेभ्यस्तेभ्यो अग्निभ्यो हुतमस्त्वेतत्.. (६) वृषभ जिन के हवि रूपी अन्न हैं, बांझ गाएं जिन का हवि हैं, सोम जिन की पीठ पर रहता है तथा जो आहुति के द्वारा सारे जगत् के विधाता हैं और वैश्वानर अग्नि जिन में सब से बड़े हैं, उन सभी अग्नियों को मेरा हव्य प्राप्त हो. (६) दिवं पृथिवीमन्वन्तरिक्षं ये विद्युतमनुसंचरन्ति. ये दिक्ष्व १ न्तर्ये वाते अन्तस्तेभ्यो अग्निभ्यो हुतमस्त्वेतत्.. (७) जो अग्नि देव आकाश, पृथ्वी और इन के मध्य भाग में व्याप्त हैं, जो बादलों में स्थित बिजली में संचरण करते हैं, जो अग्नि तीनों लोकों में व्याप्त दिशाओं में वर्तमान हैं तथा सारे जगत् के आधार वायु में संचरण करते हैं, उन सभी को मेरी आहुति प्राप्त हो. (७) ebook converter DEMO Watermarks*