अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 145, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंहे दान आदि गुणों से युक्त गंधर्वो! इस ऊपर की दिशा में तुम हमारे रक्षक बनो. बृहस्पति तुम्हारे बाण हैं. वे हमारी रक्षा करें. हम तुम्हें नमस्कार करते हैं और आहुति देते हैं. (६) सूक्त-२७ देवता—प्राची प्राची दिगग्निरधिपतिरसितो रक्षितादित्या इषवः. तेभ्यो नमो ऽ धिपतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु. यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्मः.. (१) पूर्व दिशा हम पर कृपा करे. अग्नि इस दिशा के अधिपति हैं. काले रंग के सांप उस में रक्षा करने के लिए स्थित हैं. अदिति के पुत्र धाता, अर्यमा आदि इस दिशा के आयुध हैं. इस के अधिपति अग्नि, रक्षक काले सांप, धाता अर्यमा आदि आयुधों को मेरा नमस्कार प्रसन्न करने वाला हो. जो शत्रु हमें बाधा पहुंचाता है अथवा हम जिस से द्वेष रखते हैं. हे अग्नि आदि देवो! उसे हम तुम्हारे भोजन के लिए तुम्हारी दाढ़ के नीचे रखते हैं. (१) दक्षिणा दिगिन्द्रो ऽ धिपतिस्तिरश्चिराजी रक्षिता पितर इषवः. तेभ्यो नमो ऽ धिपतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु. यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्मः.. (२) दक्षिण दिशा हम पर कृपा करे. इंद्र इस के अधिपति हैं. टेढ़ेमेढ़े चलने वाले सर्प इस दिशा के रक्षक हैं. पितर इस दिशा के दुष्टों का निग्रह करने वाले आयुध हैं. इस के अधिपति इंद्र को, रक्षक टेढ़ेमेढ़े चलने वाले सर्प को और आयुध रूप पितरों को मेरा नमस्कार प्रसन्न करने वाला हो. जो शत्रु मुझे बाधा पहुंचाता है अथवा मैं जिन से द्वेष रखता हूं, हे इंद्र आदि देवो! मैं उसे तुम्हारे भक्षण के लिए तुम्हारी दाढ़ में रखता हूं. (२) प्रतीची दिग् वरुणो ऽ धिपतिः पृदाकू रक्षितान्नमिषवः. तेभ्यो नमो ऽ धिपतिभ्यो नमो रक्षितृभ्यो नम इषुभ्यो नम एभ्यो अस्तु. यो ३ स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मस्तं वो जम्भे दध्मः.. (३) पश्चिम दिशा हम पर कृपा करे. वरुण इस के अधिपति हैं. कुत्सित शब्द करने वाला पृदाकू नाम का सर्प इस का रक्षक है और जौ, गेहूं आदि इस दिशा के दुष्टों को वश में करने वाले बाण हैं. इस के अधिपति वरुण को, रक्षक कुत्सित शब्द करने वाले पृदाकू नाम वाले सर्प को और जौ तथा गेहूं आदि बाणों को हमारा नमस्कार प्रसन्न करने वाले हो. जो शत्रु हमें बाधा पहुंचाता है अथवा हम जिन से द्वेष करते हैं, हे वरुण आदि देवो! हम उसे तुम्हारे भक्षण के लिए तुम्हारी दाढ़ में रखते हैं. (३) उदीची दिक् सोमोऽधिपतिः स्वजो रक्षिताशनिरिषवः. ebook converter DEMO Watermarks*