अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 155, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंयं क्रन्दसी अवतश्श्वस्कभाने भियसाने रोदसी अह्वयेथाम्. यस्यासौ पन्था रजसो विमानः कस्मै देवाय हविषा विधेम.. (३) संसार की रक्षा के लिए धरती और आकाश अपने स्थान पर स्थिर हैं. प्रजापति ने उन्हें निराधार प्रदेश में धारण किया है. नीचे गिरने की आशंका से भयभीत धरती और आकाश के मध्य विद्यमान वे प्रजापति रोए थे, इसलिए इन दोनों का नाम रोदसी हुआ. जिस प्रजापति का आकाश में स्थित मार्ग वर्षा के जल का निर्माण करता है, हम हवि द्वारा उन प्रजापति की पूजा करते हैं. (३) यस्य द्यौरुर्वी पृथिवी च मही यस्याद उर्व १न्तरिक्षम्. यस्यासौ सूरो विततो महित्वा कस्मै देवाय हविषा विधेम.. (४) जिन प्रजापति की महिमा से आकाश विस्तीर्ण और पृथ्वी विस्तृत हुई है, जिन की महिमा से अंतरिक्ष अर्थात् आकाश और पृथ्वी के मध्यवर्ती भाग का विस्तार हुआ है तथा आकाश में प्रत्यक्ष दिखाई देने वाला सूर्य विस्तीर्ण हुआ है, हम हव्य द्वारा उस प्रजापति की पूजा करते हैं. (४) यस्य विश्वे हिमवन्तो महित्वा समुद्रे यस्य रसामिदाहुः. इमाश्च प्रदिशो यस्य बाहू कस्मै देवाय हविषा विधेम.. (५) जिस प्रजापति देव की महिमा से हिमालय आदि सभी पर्वत उत्पन्न हुए हैं, सागर में सभी सरिताएं जिस की महिमा से समा जाती हैं—पूर्व, पश्चिम, उत्तर एवं दक्षिण चार दिशाएं जिस प्रजापति की भुजाएं हैं, हम हवि के द्वारा उस की पूजा करते हैं. (५) आपो अग्रे विश्वमावन् गर्भं दधाना अमृता ऋतज्ञाः. यासु देवीष्वधि देव आसीत् कस्मै देवाय हविषा विधेम.. (६) सृष्टि के आदि में जिन बलों ने सारे जगत् की रक्षा की, अविनाशी और जगत् के कारण हिरण्यगर्भ को जिन दिव्य जलों ने गर्भ के रूप में धारण किया, उन जलों को अपने मध्य धारण करने वाले प्रजापति की हम हवि के द्वारा पूजा करते हैं. (६) हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रे भूतस्य जातः पतिरेक आसीत्. स दाधार पृथिवीमुत द्यां कस्मै देवाय हविषा विधेम.. (७) सृष्टि के आदि में हिरण्यगर्भ उत्पन्न हुए तथा उत्पन्न होते ही सभी प्राणियों के स्वामी हो गए. उन्होंने इस धरती और आकाश को धारण किया. हम हवि द्वारा उन प्रजापति की पूजा करते हैं. (७) आपो वत्सं जनयन्तीर्गर्भमग्रे समैरयन्. तस्योत जायमानस्योल्ब आसीद्धिरण्मयः कस्मै देवाय हविषा विधेम.. ebook converter DEMO Watermarks*