अथर्ववेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Atharvaveda Samhita with Hindi Translation
डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा
स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)
पृष्ठ 174, कुल 1063 में से
संदर्भ में पढ़ेंकरें. वर्षा द्वारा सिंचित भूमि से नाना प्रकार की जौ, गेहूं आदि फसलें जाति भेद से अलगअलग उत्पन्न हों. (२) समीक्ष्यस्व गायतो नभांस्यपां वेगासः पृथगुद् विजन्ताम्. वर्षस्य सर्गा महयन्तु भूमिं पृथग् जायन्तां वीरुधो विश्वरूपाः.. (३) हे मरुद्गण! तुम स्तुति करते हुए हम लोगों को मेघों के दर्शन कराओ. वेग युक्त जल धाराएं इधरउधर बहें. वर्षा के जल की धाराएं धरती की पूजा करें. वर्षा द्वारा सिंचित भूमि से नाना प्रकार की जौ, गेहूं आदि फसलें जाति भेद से अलगअलग उत्पन्न हों. (३) गणास्त्वोप गायन्तु मारुताः पर्जन्य घोषिणः पृथक्. सर्गा वर्षस्य वर्षतो वर्षन्तु पृथिवीमनु.. (४) हे पर्जन्य अर्थात् वर्षा के देव! गर्जन करते हुए मरुतों का समूह तुम्हारी स्तुति करे. वर्षा के जल की बूंदें अनेक रूप धारण कर के पृथ्वी को गीला करें. (४) उदीरयत मरुतः समुद्रतस्त्वेषो अर्को नभ उत् पातयाथ. महर्ऋषभस्य नदतो नभस्वतो वाश्रा आपः पृथिवीं तर्पयन्तु.. (५) हे मरुतो! समुद्र से वर्षा का जल ऊपर उठाओ. दीप्तिशाली एवं जलयुक्त आकाश बादल को ऊपर उठाएं. सांड के समान गर्जन करते हुए एवं वायु से प्रेरित मेघ द्वारा बरसाए गए जल धरती को तृप्त करें. (५) अभि क्रन्द स्तनयार्दयोदधिं भूमिं पर्जन्य पयसा समङ्धि. त्वया सृष्टं बहुलमैतु वर्षमाशारैषी कृशगुरेत्वस्तम्.. (६) हे पर्जन्य! चारों ओर गर्जन करो एवं मेघों में प्रवेश कर के शब्द करो. तुम बरसे हुए जल से धरती को सींचो. तुम्हारे द्वारा प्रेरित गाढ़ा एवं वर्षा करने में समर्थ बादल आए. जल की धाराओं का इच्छुक एवं कृश किरणों वाला सूर्य छिप जाए. (६) सं वो ऽ वन्तु सुदानव उत्सा अजगरा उत. मरुद्भिः प्रच्युता मेघा वर्षन्तु पृथिवीमनु.. (७) हे मनुष्यो! शोभन दान वाले मरुत् तुम्हें तृप्त करें. अजगर से भी मोटी जल धाराएं उत्पन्न हों. वायु के द्वारा प्रेरित मेघ पृथ्वी पर वर्षा करें. (७) आशामाशां वि द्योततां वाता वान्तु दिशोदिशः. मरुद्भिः प्रच्युता मेघाः सं यन्तु पृथिवीमनु.. (८) प्रत्येक दिशा में बिजली चमके और बादलों को लाने वाली हवाएं चलें. वायु के द्वारा ebook converter DEMO Watermarks*